सरभंग सम्प्रदाय : सामान्य परिचय - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



'सरभंग सम्प्रदाय' संत मत के एगो शाखा ह। जवना के सम्बन्ध कुछ विद्वान लोग अघोर पंथ से जोड़ले बा। कवनो मत भा पंथ से कोई शाखा तबे फूटेला, जब ओकरा व्यवहार, सिद्धांत आ आध्यात्मिक साधना के स्तर पर केहू विशेष प्रभावशाली प्रतिभा-सम्पन्न सिद्ध साधक अपना पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव ले आवेला आ ओकर शिष्य जमात ओकरे राहे आगे बढ़ेला। कवनो मत, पंथ भा सम्प्रदाय में बदलाव आ बढ़ाव के ई सनातन स्वाभाविक प्रक्रिया ह। वैदिक, उत्तर वैदिक, जैन, बौद्ध, सिद्ध, नाथ आ निरगुन-सगुन मत सब के क्रमवार विकास एही क्रम से भइल बा। कवनो नया पंथ भा सम्प्रदाय अपना से पुरान मत का प्रासंगिकता तत्वन के अपना समय-समाज के हित में अपना तौर तरीका के हिसाब से अपनावत आ ओकरा अप्रासंगिक चीजन के दरकिनार भा विरोध करत एगो नया स्वरूप में सामने आवत जाला। हं, एकर प्रवर्तक केहू प्रभावशाली चमत्कारी व्यक्ति आ ओकर आचार-विचार जरूर होला। ओह पंथ का नामकरण के पीछे भी कवनो ना कवनो चमत्कारी व्यक्ति भा ओकरा सिद्धांत के आधार होला। सरभंग सम्प्रदायो से इहे सिद्धांत जुड़ल बा।

'सरभंग सम्प्रदाय' के नाम आ अर्थ के लेके विद्वान लोग राय अलग-अलग बा। सरभंग शब्द के लेके आम तौर पर सरभंगी साधु-संत लोग के एगो उक्ति प्रचलित बा - 'सर साधे सरभंग कहावे '। जे सर के साधना करेला उहे सरभंग कहाला। इहाँ संत लोग 'सर' के अर्थ 'स्वर' भा 'पंचेन्द्रिय' अर्थात् पाँचो इन्द्रिय आ 'भंग' के अर्थ निरोध बतावेला। एह तरह से सरभंगी साधु-संत लोग सरभंग के अर्थ योग साधना से जुड़ल आध्यात्मिक क्रिया के माध्यम से स्वर आ चित्तवृत्ति के निरोध बतावेला। (बिहार का संत साहित्य - डॉ. बिनोद कुमार सिंह , पन्ना -२२२)। डॉ. धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री एही चीज के अपना तरीका से कहले बाड़ें - 'सर' शब्द के व्युत्पत्ति शर ( बान/ तीर) आ स्वर ( नाद ) एह दूनो शब्द से मानल जा सकऽता। 'शर' के अर्थ होला बान आ ऊ काम का पाँच बानन के खेयाल से पाँच संख्यो के द्योतक बा। एह तरह से ' शर ' के अर्थ जीवात्मा के बेधेवाला पाँचो इन्द्रिय न से मानल जा सकऽता। तंत्रशास्त्र में 'स्वर' एगो पारिभाषिक शब्द ह आ ऊ स्वरोदय आदि ग्रंथन में इंगला, पिंगला आ सुषुम्ना - एह तीनो श्वास- प्रश्वास का क्रिया के सूचित करेला। एह से एह व्युत्पत्ति के अनुसार 'सरभंग' शब्द के अर्थ भइल - ऊ साधक भा संत जे अपना इन्द्रियन आ वासना के अपना कस में (नियंत्रण में) कर सके।' (संत मत का सरभंग सम्प्रदाय , पन्ना - ११५-११६)

डॉ. विनोद कुमार सिंह के अनुसार 'संत सदानंद जी एह 'सरभंग' के बदले 'सरबंग' शब्द के प्रयोग कइले बाड़न। मध्ययुग के दरियादास, धरनीदास आदि संतलोग निरगुन ब्रह्म आ संसार से निर्लिप्त संत खातिर 'सरबंग' शब्द के प्रयोग कइल गइल बा। सरभंगी संत मोती दास अपना ग्रंथ 'ज्ञान सागर' में सरभंग शब्द के मरम बतावत लिखले बाड़न - '

धरती जो सरभंग है सब में रहे समाय।
सब रस उपजत खपत है मोतीचरन मनाय।।'

कुछ सरभंगी संत भा मत के अनुयायी 'सरभंग' शब्द के अर्थ समदर्शी बतावत कहले बाड़न कि जेकरा निरगुन-सगुन , शैव-वैष्णव, हिन्दू-मुस्लिम, ऊँच-नीच, नीक-जबून, पंडित-चंडाल, खाद्य-अखाद्य, ग्राह्य-त्याज्य आदि में कवनो तात्विक अन्तर नइखे। सब एके विभु के प्रतिच्छाया भइला के कारन समान रूप से अंगीकार करे जोग बा। एह सिद्धांत के बेवहार में जीये वाला साधक खातिर 'सरभंग' शब्द के प्रयोग कइल जाला। समभाव से सांसारिक जीवन जीये वाला साधक के सरभंगी संत बतावत भक्त राधारमण के कथन बा -

'स्वर के रथ पर जो चढ़े, रमे सकल सो राम।
सरभंगी ताको जानिए स्वर को करे विराम।।'

कुछ विद्वान सरभंग सम्प्रदाय के सम्बन्ध वैदिक ऋषि 'सरभंग' से भी जोड़ेलें।(बिहार का संत साहित्य - डॉ. विनोद कुमार सिंह, पन्ना-२२२)

'सरभंग' शब्द सम्बन्धी अब तक के तमाम विचारन के आधार पर कहल जा सकेला कि 'सरभंग' शब्द के प्रयोग संसार में समभाव से जीयत आध्यात्मिक साधना में लीन साधकन खातिर कइल गइल बा जे यौगिक क्रियन भा साधना से स्वर के साधना करत चित्तवृत्ति के निरोध करेलें। अइसे ई यौगिक साधना पद्धति सनातन काल से भारतीय आध्यात्मिक जीवन धारा के अंग रहल बा आ एकर धारा समय, परिवेश आ परिस्थिति के दिसाईं कबो धीमा आ कबो तेज होत रहल बा। सिद्ध, नाथ आ निर्गुनिया संत लोग से लेके सरभंग सम्प्रदाय के साधु-संत तक ई आध्यात्मिक धारा लोक-मंगलकारी रहल बा।

एह सरभंग सम्प्रदाय का साधु-संत लोग का साधना के मुख्य केन्द्र बिहार के चम्पारन, सारन, मुजफ्फरपुर, उत्तर प्रदेश के बनारस आ नेपाल के तराई क्षेत्र रहल बा। प्रमुख सरभंगी संत रहलें - भिनक राम, केसो राम, प्रीतम राम, भीखम राम, टेकमन राम, योगेश्वराचार्य आदि।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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