ए सुखारी चाचा।

कटहर लेखा मुंह काहे लटकल ए सुखारी चाचा।
लागता कि हार तोहरा खटकल ए सुखारी चाचा।।

ताल के टोपरा बेंच बांच के लड़ल ह तूं बिधयकी।
हरलह त पोंछिया तहार सटकल ए सुखारी चाचा।।

भोरहीं भोरहीं तूं त दारु से करत रहलs ह कूल्ला।
फुटानी के बरखा त अब चटकल ए सुखारी चाचा।।

बहुत दिनन से डूबि डूबि के पीयत रहल ह पानी।
लगता कि अबकी टेंगर अंटकल ए सुखारी चाचा।।

राजनीति के छोड़s चस्का जा अब कीनs कटोरा।
साधू चा के पिछवा चलs लटकल ए सुखारी चाचा।।

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