'उर्दू' सब्द के व्युत्पत्ति आ भासा के अर्थ में प्रयोग के परम्परा - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



'उर्दू' सब्द के व्युत्पत्ति के लेके बिद्वान लोग के बीच चल रहल संबाद उपयोगी बा। हमहूँ अपना अध्ययन के आधार पर एह संबाद के सार्थक बनावे के चाहत बानी।

साँच कहीं त ई 'उर्दू' सब्द चीनी भासा का 'ओर्दू' सब्द से व्युत्पन्न बा। जवना के अर्थ होला - घुमक्कड़ चाहे यायावर। तुर्क, मंगोल आ तातार, मूल रूप से हुन ( हुण ) के बंसज हवें। हुन लोग के मूल निवास उत्तरी चीन रहे। ई चीन के लड़ाकू आ जुद्ध प्रिय जाति रहे। जवना के चीनी भासा में 'शान-यू' अर्थात् लड़ाकू कहल जात रहे आ एह लड़ाकू जाति के घुमक्कड़ी आ यायावरी प्रवृत्ति के चलते चीन में 'ओर्दू' कहल जात रहे। पहिली सदी से कुछ समय पहिले चीनी लोग एह ओर्दू हुन लोग का लड़ाकू सुभाव का चलते चीन से भगा दिहल आ ई लोग मंगोलिया होत मध्य एसिया पहुँचल। एह लोग के कबीला आ खेमा खातिर 'ओर्दू' सब्द के बेवहार होत रहल। एह हुन लोग के बंसज तुर्क का इतिहास में चउथी सदी के आसपास दिखाई पड़त बाड़ें। एही लोग के जरिए ओर्दू सब्द तुर्क लोग के बीच चलन में आइल। तुर्क में भी एह ओर्दू सब्द के प्रयोग यायावर जाति चाहे खेमा आ कबो कबो सेना चाहे सैनिक पड़ाव खातिर होत रहे। प्राचीन उजबेक में 'ओर्दू' 'किला' के अर्थ में आ पस्तो में ' लस्करी पड़ाव ' के अर्थ में मिलेला। उज़्बेकिस्तान के राजधानी तासकंद में 'उर्दा' एगो सहरो के नाम बा।

एह तरह से ई 'ओर्दू' सब्द चीन से चलके मंगोलिया आ तुर्क होत भारत पहुँचल। मुगल बाबर आ बाबर का पहिले तुर्क लोग का संगे ई सब्द खेमा, तम्बू, सैनिक पड़ाव आदि खातिर प्रयोग में रहे। 'ऊ' अधिक बलाघात का चलते 'ओ' कोमल होके 'उ' हो गइल। साहजहाँ के समय सबसे उम्दा साही पड़ाव के 'उर्दू-ए-मुअल्ला' कहल जात रहे। अरबी भासा के सब्द 'मुअल्ला' के अर्थ होला- उम्दा चाहे श्रेष्ठ। 'उम्दा साही पड़ाव' का भासा के 'जबान-ए-उर्दू-ए-मुअल्ला' कहात रहे। बाद में 'मुअल्ला' सब्द हट गइल आ 'जबान-ए-उर्दू' रह गइल। जवना के अनुबाद भइल - उर्दू के जबान ( उर्दू के भासा/ लैंग्वेज ऑफ उर्दू )। बाद में खाली उर्दू के प्रयोग भासा के अर्थ में होखे लागल। जवना में अरबी-फारसी का सब्दन के बहुलता रहे। हिन्दुस्तानी मुगलिया राजकाज के भासा अरबी-फारसी प्रधान उर्दू होखे का चलते एकर एगो आउर नाम हिन्दुस्तानी रखाइल। जवना के समानान्तर एह देस के जनता उनइसवीं सदी का सुरूआती काल तक अपना देसी भासा चाहे भाखा में आपन संबाद करत रहे आ साहित्त रचत रहे। एह भासा भा भाखा के आपन-आपन अलग-अलग क्षेत्रीय नामो रहे।

उनइसवीं सदी के आवत-आवत धूर्त्त अंगरेज सब देसी भासा चाहे भाखा के दबावत हिन्दुस्तानी भासा से अरबी-फारसी के सब्द निकाल के कौरवी,बांगरू, हरियानवी आ पच्छिमी सौरसेनी का भासिक तत्वन के आधार पर हिन्दू लोग खातिर एगो भासा 'खड़ी बोली' आ अरबी-फारसी प्रधान सब्दन के आधार पर मुसलमान लोग खातिर 'उर्दू' भासा के नींव डाल के दूनों कौम में बिभेद पैदा करके साजिस रचल। एकरा बावजूद आजुओ खड़ी बोली जवना के नाम बाद में हिन्दी रखाइल, में अरबी-फारसी के सब्द के प्रयोग जरूरे मिलेला आ उर्दू भासा पर हिन्दी भासा का बेयाकरन के प्रभाव साफ झलकेला। जवना के चलते उर्दू के हिन्दी के एगो सैली भी कहल जाला। बाकिर भासा के अर्थ में उर्दू सब्द के प्रयोग हिन्दी से पुरान बा आ हिन्द के मुसलमान के अर्थ में हिन्दी सब्द के प्रयोग उर्दू सब्द से कम पुरान नइखे।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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