काव्य : परख आ परिभाषा - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



भारतीय वाङ्मय के दू गो रूप बा - शास्त्र आ काव्य। एह दूनो के अलग-अलग परखे खातिर एह दूनो के लक्षण आ परिभाषा पर भारतीय आचार्य लोग खूब बारीकी से बिचार कइले बा। चूकि इहाँ वाङ्मय के शास्त्र रूप से इतर काव्य रूप के परखल हमार प्रयोजन बा। एह से अबहीं काव्य के लक्षण, आचार्य-बिद्वान लोग के दिहल काव्य के परिभाषा पर बिचार कइल जाई।

आउर बिसय-बस्तु जइसन काव्यो के बाहरी आ भीतरी रूप आ गुन के आधार पर अलग-अलग लक्षण आ परिभाषा बतावत बा। बाहरी निरूपक लक्षण में काव्य का बाहरी चिन्ह के उल्लेख कइल गइल बा आ अंतरंग निरूपक लक्षण में ओकरा भीतरी चिन्ह के बतावल गइल बा। काव्य के बाहरी रूप-चिन्ह के आधार पर लक्षण आ परिभाषा बतावे वाला आचार्य लोग में प्रमुख बाड़ें- अभिनव गुप्त, मम्मट, भामह आदि। त ओकरा भीतरी तत्व-चिन्ह के आधार पर ओकर लक्षण आ परिभाषा तय करे वाला आचार्य लोग बा- दण्डी, जगन्नाथ आदि।

काव्य के लक्षण बतावत अभिनव गुप्त अपना 'ध्वन्यालोक लोचन' कहले बाड़ें कि काव्य कवि-कर्म ह - 'कवनीयं इति काव्यम्।' काव्य कवि के एगो शाब्दिक निर्मिति ह। ई 'कवि' शब्द बनल बा 'कु' धातु में अच् प्रत्यय ( इ ) के मेल से। इहाँ 'कु' के अर्थ बा - व्याप्ति, आकास, अनंतता अर्थात् सर्वज्ञता। एह तरह से कवि मतलब ऊ विशिष्ट व्यक्ति जे सर्वज्ञ के पर्याय होखे। देखनिहार (द्रष्टा) आ सिरजनिहार ( स्रष्टा ) दूनो होखे। एही से कवि ओह मनीषी के कहल जाला जे अपना अनुभूति में जीवन-जगत के सब-कुछ समेटे के शक्ति से सम्पन्न होखे - 'कवि मनीषी परिभू: स्वयम्भू:।' 'काव्य प्रकाश' में आचार्य मम्मट बतवले बाड़न कि लोकोत्तर आनंद के प्राप्ति करावे वाला कवि के भाषिक अभिव्यक्तिए काव्य ह -' लोकोत्तार वर्णनानिपुण कवि कर्म काव्यम्।' कवि का एह कर्म के काव्य आ एह काव्य के रचे वाला कवि के ब्रम्हा कहल बा- ' अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति। यथाऽस्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।।'

आचार्य मम्मट त कवि का सृष्टि के ब्रम्हा का सृष्टि से अधिका सुन्दर आ आनंददायक बतवले बाड़न। ब्रम्हा के सृष्टि नियति के बनावल विधान आ सत्त्व, रज आ तम गुन से बनल होखे का चलते सुख, दुख आ मोह पैदा करेला। उहँवे कवि के सृष्टि नियति के बनावल नियम से रहित आ खाली आनंद देवे वाला होला। ऊ कवि के छोड़ के केहू पर आश्रित ना होखे-

'नियति-कृत-नियम-रहिता-
माह्लादैकमनीयमनन्यपरतन्त्राम्।
नवरस रुचियां निर्मितिमादधती,
भारती कवेर्जयति।।'
( काव्य प्रकाश- मंगल श्लोक )

आचार्य मम्मट 'काव्य प्रकाश' में काव्य लक्षण बतावत ओकर परिभाषा देले बाड़न कि जवन शब्दार्थ मतलब रचना दोष से रहित, गुन से भरपूर आ अलंकार से युक्त भा कबो अलंकार से हीनो होखे, उहे काव्य ह - 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि।'

काव्य का एह लक्षण पर बिचार करत जहँवा कुछ आचार्य शब्द के काव्य खातिर प्रमुख बतावत बाड़ें उहँवा अधिकतर आचार्य के अनुसार काव्य शब्द आ अर्थ के सम्यक् आ सुन्दर समन्वय में होला। शब्द आ अर्थ के नित्य-सम्बन्ध रहेला। शब्द के उचारते अर्थ अपने आप सोझा आ जाला, आ दूनो मिलके काव्यगत आनंद उत्पन्न करे में समर्थ हो जालें। काव्य दूनो में समभाव से रहेला। एही से ' वागर्थ' का नित्य-सम्बन्ध के उपमा कालिदास 'अर्धनारीश्वर' से देले बाड़न।

काव्यालंकार में आचार्य भामह भी कहले बाड़न कि शब्द आ अर्थ के सहभाव काव्य ह- 'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्।' शब्द बिना अर्थ के ना रह सके आ अर्थ के अभिव्यक्ति शब्द के बिना होइये ना सके। शब्द आ अर्थ के 'काव्य' कहाये खातिर तीन खुबियन के जरूरत होला- दोष के परिहार, गुन के सद्भाव आ अलंकार के स्थिति। अइसे अलंकार के अभावो में कबो-कबो शब्द आ अर्थ के समन्वय के 'काव्य' कहल जाला।

दोष के परिहार - जब काव्य में श्रुति कटुता, संस्कारहीनता आ भग्नप्रक्रमता आदि दोष आ जाला त उहँवा 'काव्य' के सिद्धि ना हो पावे। एह दोसन से युक्त काव्य के आचार्य लोग दुष्ट काव्य कहले बा।

गुन के सद्भाव - काव्य का शब्दार्थन के गुन सम्पन्न भइल जरूरी बतावल बा। काव्य में मुख्य रूप से तीन गो गुन होला- माधुर्य, ओज आ प्रसाद। ई गुन सब काव्य के आत्मा ' रस ' के अचल धर्म ह। गुन के सम्बन्ध रस से बा आ ई परोक्ष रूप से शब्द आ अर्थ का सङही रहेलें। बाकिर एह पर कविराज विश्वनाथ के आपत्ति ई बा कि एह गुन सबका रहे भा ना रहे से काव्य के उपादेयता बढ़ भा घट सकऽता। अइसन थोड़े बा कि गुन के अभाव में ऊ काव्य रहिए ना जाई। जइसे दयालु भा मयार होखे भा ना होखे से आदमी के मान-बराई बढ़ भा घट सकेला। अइसन थोड़े होई कि एह गुन से हीन आदमी आदमिए ना रह जाई। बाकिर अधिकतर आचार्य गुन के रहल जरूरी मनले बाड़न। महाभारत में ब्यास जी श्रव्यत्व, श्रुतिसुखत्व, समता आ माधुर्य के काव्य रचना खातिर जरूरी गुन बतावत कहले बाड़ें- 'श्राव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम्।'

अलंकार के अनिवार्यता - काव्य के अलंकार से युक्त रहे के चाहीं। बाकिर कुछ स्थिति में अलंकार के जरूरत नाहिंयो रह जाए। काव्य में चमत्कार दू तरह से हो पावेला - अलंकार के जरिए भा रस के जरिए। जदि रस के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न हो गइला पर अलंकार के अनिवार्यता महत्व ना राखे।

संस्कृत में एगो काव्य में नायिका के विरह वियोग से सन्तप्त नायक अपना पहिले का अवस्था का सङे वर्तमान विरह वेदना वाला हालत के तुलना करत कहऽता - हम मिलन में बाधक बने भा अलग रह जाए का डर से अपना सुन्दरी का गला में हार ना पहिरवनीं; काहे कि हमनीं का बीचे हार के आ जाए से आलिंगन ठीक ढ़ंग से हो पाई। ई त भइल संजोग के मनभावन कल्पना। बाकिर आज! आज त उनका आ हमरा बीचे नदी, समुन्दर आ पहाड़ आ के खड़ा हो गइल बाड़ें। एकरे के घनानंद का शब्दन में देखल जा सकेला -

'तब हार पहार से लागत हे
अब बीच में आनि पहार अड़े।'

बाकिर आचार्य मम्मट के लक्षण ऊपरी आ वर्णनात्मक बा।

काव्य का अंतरंग मतलब भीतरिया लक्षण पर बिचार करत साहित्य दर्पणकार कविराज विश्वनाथ के दिहल परिभाषा बा कि रसात्मक वाक्य काव्य ह- 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।' अर्थात् चमत्कार उत्पन्न करे वाला भा अलौकिक आनन्द देवे वाला वाक्य काव्य ह। इहाँ 'रस' शब्द के अर्थ विस्तार लेले बा। बाकिर पंडितराज जगन्नाथ विश्वनाथ का काव्य सम्बन्धी एह लक्षण भा परिभाषा पर ई कहके आपत्ति कइलें कि जदि रसात्मक वाक्ये काव्य ह तब त जवन रचना रस के बदले अलंकार के जरिए चमत्कार उत्पन्न करी ऊ त काव्य कहइबे ना करी। महाकवि लोग अपना महाकाव्यन में नदी, पहाड़, जंगल, झरना आदि के बरनन कइले बा। जवना बरनन से रस के सीधे-सीधे सम्बन्ध हइए नइखे तब त ऊ अकाव्य हो जाई। एह से ऊ विश्वनाथ का लक्षण के सकेत बतावत अपना काव्य लक्षण में रस आ गुन के ओर बिना संकेत कइले कहलें कि रमणीय मतलब आनंददायी चमत्कारी अर्थ के प्रतिपादित करे वाला शब्द काव्य ह - 'रमणीयार्थ-प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्।' जवन रचना हृदय के प्रभावित करके ओह में अलौकिक आनन्द के संचार करे, उहे काव्य ह।

पंडित जगन्नाथ का एहू काव्य लक्षण पर कुछ लोग आपत्ति करत कहल कि शब्द से रमणीय अर्थ के प्रतिपादन ना होखे, वाक्य से होला आ दोसरे अर्थ का रमणीयता के अलावे शब्दो के रमणीयता काव्य में होला। शब्द-चारुता से भी काव्य रमणीय बन जाला। तब डॉ. भगीरथ मिश्र कहलें कि रमणीय अर्थ के प्रतिपादक वाक्य काव्य ह - 'रमणीयार्थ प्रतिपादकम् वाक्यं काव्यम्।' बाकिर आचार्य दंडी शब्द, शब्दार्थ आ वाक्य के रमणीयता रसात्मकता के आधार पर काव्य के लक्षण भा परिभाषा ना बताके इष्ट अर्थ मतलब मनोरम अर्थ से विभूषित पदावली के ही काव्य के सरीर मनले बाड़न। आ सही मायने में रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द अथवा रसात्मक वाक्य के बदले रमणीय भाव-अर्थ के उत्पन्न करनेवाला पदावली के ही काव्य कहे के चाहीं। अइसे हर आचार्य आ विद्वान अपना-अपना सामर्थ्य के अनुसार काव्य के लक्षण आ परिभाषा बतवले बा। एही के आचार्य दंडी कहलें कि हम अपना सामर्थ्य शक्ति के अनुसार काव्य के लक्षण बतवले बानी- 'यथासामर्थ्य अस्माभि: क्रियते काव्यलक्षणम्।'
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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