भूँजा-महिमा: डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



आज सनीचर ह आ लोक मान्यता बा कि सनीचर के भूँजा खइला से सनिदेव सांत रहेलें। एह से सनीचर के एको मुट्ठी भूँजा जरूर खाए के चाहीं।अइसे हम रोजे भूँजा खाइले। ई हमरा परिवार के पारंपरिक अल्पाहार बा। हमरा खूब इयाद बा। लरिकाईं में साँझ होखे का पहिले हमार ईआ हमरा से बाबा आ बाबूजी का लगे भूँजा आ ओकरा संगे- संगे नून, मरिचा आ पेआज जरूर भेज देस। जवना में मकई, चाउर, चिउरा, बूंट-चना, केराव, खेसारी आदि के भूँजा रहत रहे। कबो कबो महुओ भूँजा के जाए। अलग-अलग अनाज का भूँजा के अलग-अलग नांव होत रहे; जइसे- फूटहा, फरुही, लावा, ठूढ़ी, मुढ़ी, घुघुनी, खंसिआ, चिउरी, लाटा आदि। हमरा इहाँ त बजाप्ते अपना जमीन में एगो कानू परिवार के घोनसार बनवा दिहल रहे। पहिले उहे अनाज माँग के ले जाए लोग आ भूँजा भूँज के दे जाए लोग। गांव भर के लइकी-मेहरारू अनाज लेके जास आ भूँजा भूँज के ले जास अउर ओकरा बदला में घोनसार वाला कानू परिवार के भाड़ दे देस। हम त केतना गरीब परिवार के भूँजे फाँक के गुजर बसर करत देखले बानी। ओइसने लोग के मुँह से सुनले बानी जे ' घनेघना, कबो भूँजल चना, कबो उहो मना।' अभाव वाला परिवार में जब मेहरारू कवनो चीज के फरमाइश करऽ स त घर के मालिक भा मलकीनी मेहना मारस कि 'घर में भूँजल भांग ना आ बीबी पादस चिउड़ा'। एही भूँजा से जुड़ल एगो किस्सा मन पड़ गइल। कह देत बानी ना त भोरा जाएम।

एगो गरीब परिवार के लरिका कमाए बाहर जात रहे। घर पर ओकर मतारी आ छोट बहिन रह गइल। बाहर जाके ऊ मर-मजूरी करे लागल। जवने कुछ आमद होखे ओह के बचाके घरे भेज देवे आ अपने जइसे-तइसे नून, मरिचा आ भूँजा-फुटहा खाके दिन गुजार देवे। घरे ओकर माई-बहिन बूझऽ स जे अपने खूब ठाठ से कमात-खात होई आ हमनीं ई थोड़-ढ़ेर पइसा भेज देत होई। जब ऊ लरिका बहरा से घरे आइल त ओकर मतारी पुछलस- 'ए बबुआ, ओजा तूं काथी खात रलऽ ह?' एह पर ऊ बोलल- ' का कहीं माई, मजूरी बहुते कम मिलत रहे। जवन जोगा के घरे भेज देत रहीं आ अपने नून, मरिचा आ फुटहा पर दिन काट लेत रहीं।' एतना सुनते ओकर मतारी कोहना के बोलल- ' ए लरपूत्ता के तीन तीन सवाद- नून मरिचा फूटहा आ हमनी माई-बेटी खीर-पूड़ी पर जीहीं चाहे मरीं।' एह तरह से भूँजा अभाव के अहार ह आ भरला के अल्पाहार। एगो आउर किस्सा मन पड़ गइल त सुनिए लीं सभे।

जब देस आजाद हो गइल आ जिमदार लोग के जिमदारी छिना गइल त ओह लोग हालत दिन पर दिन लचरे लागल। एगो जिमदार के दिन अइसन लचरल कि फूटहो दूलम हो गइल। बाकिर सुदिन के सेवक दुर्दिन में अपना मालिक के छोड़ के कहीं ना गइल। हरमेस अपना मालिक के सेवा-टहल में लागले रहत रहे। जब ओकरा भूख लागे त अगल बगल के सुनावे खातिर घर के केवाड़ी बन क के जोर जोर से बोले - ' कवना चीज के भूँजवा खाईं? चना के खाईं कि बेदाम के खाईं आ कि मकई के खाईं? अच्छा आज चाउरे-चिउड़ा के भूंजा खा के रह जा तानी।' एक दिन जिमदार साहेब सुनलें त उनका ताजुब भइल कि घर में कवनो अनाज बा ना, आ ई एतना तरह के भूँजा केंवाड़ी बन क के खाता। ऊ ऊपर के जंगला से झाँक के देखलें त सोच में पड़ गइलें कि ई त खेयाले में ई सब खाता। अब ऊ अगिला दिन आपन केवाड़ी बन क के जोर-जोर से कहे लगलें कि खीर-पूड़ी आ आलू दम खा लीं कि घीव से बघारल रहर के दाल, बासमती चाउर के भात आ तरकारी- अँचार खा लीं कि पुअवे खा के रह जाईं। ई सुनके नोकरवो जंगला से झाँक के देखे गइल कि हम त अगल-बगल के सुनावे खातिर झूठे भूंजा खाए के बात कहिले आ एने मालिक हमरा चूपे सब पर-पकवान खा रहल बाड़ें। ऊ देखऽता कि मालिको के हाल हमरे वाला बा। ऊ आँखि के लोर पोछत केवाड़ी खोल के बोलल- मालिक रउरो? एह पर मालिक बोललें कि रे बुड़बक, जदि झूठे खाए के हल्ला करेके बा त भूँजा काहे? पुआ पकवान काहे ना?'

एह तरह से भूँजा के सम्बन्ध लोक साहित्य आ संस्कृति से खूब बा। भूँजा के लेके तरह तरह के लोकोक्ति, सुक्ति, दोहा , किस्सा सुने के मिलेला। भूँजल चना के चबा के खाए का चलते ओकरा के चबेना कहल जाला। कबीरदास सभका के सचेत करत कहले - ' खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद। ' प्रेमचन्द अपना 'दंड' कहानी में लिखले कि ' मुकदमे वाले वही सत्तू चबेना खाते और दोपहरी उसी की छांह में काटते थे।' हरि भटनागर अपना ' सीपो सीपो ' कहानी में लिखलें कि ' मरघिल्ले ने न चबेना खाया और न पानी पिया।'

इहाँ भूँजा के प्रयोग ओह अर्थ में नइखे होखे जात जवना अर्थ में एक बेर एगो टोला अझुराइल रहे। खेल-खेल में लइकन का आपुस में टेना-मेनी भइल आ रगड़ से अइसन लुत्ती लहकल कि टोला-टोला का बीचे लहोक के रूप ले लिहलस आ दूनों टोला के लोग एक दोसरा के देख लेवे आ भूँजा भूँज देवे पर उतारु हो गइल रहस। लोक में भूँजा सब्द के कई अर्थ में प्रयोग होला। इहाँ भूँजा के मुख्यार्थ बा अनाज के भूँज के खाए वाला सामग्री। पहिले गाँव में एकरा खातिर बड़ा उतजोग होखे। कानू परिवार के अपना भा दोसरा के जमीन में घुनसार (घोनसार) बनावे के पड़े। टाट-पलानी छवावे के पड़े।गाछ-बिरीछ, झाड़-झखांड़ भा बाँस के सुखल लकड़ी-पत्ता के एकट्ठा क के गाँज बना के राखे के पड़े। पानी-बरसात से बचावे के पड़े। देसी बालू, चलउनी, खोरनी वगैरह के जोगाड़ करे के पड़े। अड़ोस-पड़ोस से आगी मंगाकर घोनसार झोंक खातिर आगी तइयार करेके पड़े। घोनसार झोंकाता, एकर सूचना घरे-घरे पहुंचावे के पड़े। टोला भर के बहिन-बेटी सब अपना-अपना घर से दउरी, दउरा आ चगेंली में अगल-अगल तरह के अनाज लेके पहुँचऽ स। जे पहिले आवे ओकरा अनाज भूँजे के पहिले मोका मिले। एही में रगड़-झगड़ हो जाए। कबो कबो झोंटा-झोंटी के नौवत आ जाए त समझदार अकिला फुआ भा चाची-आजी समझा-बुझा के झगड़ा फरिआवे लोग। ओह घोनसार में परिवार, टोला आ गांवे ना नातेदारियो के कथा-कहानी होखे। एकरा घर में सास-पतोह में झोंटा-झोंटी होता? केकर पतोह सलहथ आइल बिआ। केकर पतोह कान भा लंगर बिआ। केकर पतोह जवार भर में टप बिआ। केकर मरद अपना मेहर के खूब मानेला। केकर बिआह तय हो गइल आ केकर बिआह कट गइल आदि आदि। अदोबदो के सतुआनी आ खिचड़ी के अनाज भूँजे खातिर झोंएं-झांए होखे। एक बेर एगो प्रवचन में गोंसाई जी कथा कहत रहस कि 'एक बेर एक जगे कम्पिटीशन होत रहे कि जे सबसे लमहर झूठ बोली, ओकरा पुरस्कार दिआई। त सभे अपना-अपना हिसाब से आपन झूठ के अनुभव बतावल। ओही में एक आदमी कहल कि ' हम आवत रहनीं ह त रास्ता में एगो घोनसार में ढ़ेर मेहरारू भूँजा भूँजत रहल ह लोग आ सभे चूप रहल ह। केहू केहू से बोलत ना रहल ह।' जज एही आदमी के सबसे लमहर झूठ बोले वाला बताके पुरस्कार देत कहलें- 'ई संसार के सबसे लमहर झूठ इहे बा कि मेहरारू लोग भूँजा भूँजे खातिर घोनसार में एकट्ठा होखे आ आपुस में बतिआवे ना। ई हो नइखे सकत।' एह तरह से भूँजा आ घोनसार से जुड़ल ढ़ेर कथा-कहानी बा। बाकिर गवें-गवें अब ई सब कम होत जाता। हर नगर-सहर में भूँजा के दुकान खुल गइल बा। मरद लोग खुदे भूँजा भूँज के बेच रहल बा। किसिम-किसिम का अनाज के किसिम-किसिम के ढंग से तइयार कइल भूँजा। सादा भूँजा। बनावल भूँजा।

आईं अब एह भूँजा के सामाजिक, दार्शनिक आ चिकित्सा से जुड़ल मोल-महातम पर बिचार कइल जाव। भूँजा भूँजे आ खाए में सामुहिकता के भाव होला। ई लमहर सफर के साथी ह। भूँजा फाँकत-चबावत बतिआवत रहीं । पते ना चली कि सफर कब पूरा हो गइल। जब समय ना कटत होखे त भूँजा लेके बइठ जाईं आ गलचउर चालू कर दीं फेर देखीं एकर कमाल। भूँजा खाए घरी कवनो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय भा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा पर चर्चा होखे लागी त बात कहाँ से कहाँ पहुंच जाई। ई समाजिकता बढ़ावे का संगे-संगे गरीबी आ अभाव में भूख मिटावे के बड़ साधन होला। ई आपुस के उंच-नीच, आपन-गैर, बड़-छोट, अमीर-गरीब आदि के भेदभाव मिटा देला। सभे एकरा के एके संगे बइठ के खा लेवेला। ई हीन भावना के खतम कर देवेला। कुछ लोग जे भीतर सतुआ खाके ओठ पर घीव मलत निकलेला जे हम हई चीज खाके आवत बानी। भूँजा एह बनावटी आ देखावटी मुखौटानुमा जिनगी जीए से मुक्ति दिलावेला। भूँजा में हर तरह के मोट-मेंही आ सस्ता-महंगा अनाज एके संगे मिलल-जुलल रहेला जवन सभका के हर तरह के भेदभाव मिटा के आपुस में मिलजुल के जीए-रहे के सीख देला। ई मिलावट से अछूता होला आ खाए वाला के मिलावटी आ बनावटी दुनिया से परहेज करे के सीखावेला। एकरा के सामूहिक रूप से बाँट के खाइल जाला। जवना से आदमी में सामूहिकता के भाव जागेला। ई अल्पाहार के ऊ रूप ह जवन आदमी के लोकबद्ध करेला। ई सांच कहीं त लोकतांत्रिक आ अन्नपूर्णाधर्मी आहार ह।

सबसे बड़ बात ई बा कि भूँजा जल्दी खराब ना होखे। ई बरतन के अभाव में खदोना में, अखबार पर, गमछा पर, अंजुरी आ मुट्ठी, फांड़ा, घोघी, अँचरा आदि में लेके खाइल जा सकेला। ई बहुत दिन ले रह सकेला। मेहरइला पर फेर से गरमो कइल जा सकेला। ई एगो अइसन दार्शनिक बोध करावेला जवन बड़-बड़ साधु-महात्मा ना करा सकस। अनाज भूँजा गइला पर दोबारा जाम ना सके। जवन ई दर्शन प्रस्तुत करेला कि जे आदमी अपना मन आ चित् के ज्ञान-भक्ति का आगी में भूँज देला ऊ आवागमन का झंझट से मुक्ति पा लेवेला।

अतने ना एकरा के लेके कई गो बैदकी आ डॉक्टरी खोज भइल बा। भूँजा खइला से मुँह के कल्ला आ दाँत मजबूत होला। पेट के आँत साफ रहेला। पेट में गैस आ एसीडिटी ना बने देवे। दाँत आ आँत के मजबूती से आदमी के माथ ठीक तरे काम करेला। जवना से आदमी तनाव से दूर रहेला। रक्त के संचार ठीक रहला से ब्लड प्रेसर आ हार्ट के बेमारी ना होखे। एह से बेमतलब के दवा-बीरो में पइसा खरच ना होखे। गरीब-मजदूर इहे खाके स्वस्थ रहेलें। भूंजल चना एह लोग के बेदाम आ भूंजल महुआ एह लोग के किसमिस ह। इहे खाके ई लोग अखाड़ा में काजू-किसमिस खाके पहलवान बनल लोग के धोबिया पाट लगा देला।

एने डॉक्टर बतावेला कि भूँजल चना में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन आ फास्फोरस, विटामिन मिलेला। हर होस्पीटल में डायटिशियन लोग आहार में भूँजा के सम्मिलित करे के राय देला। एकरा से देह में रोग से लड़े जुगुत प्रतिरोधक क्षमता के इजाफा होला। ई हर मौसम में लिहल जा सकेला। बेर बेर पेसाब होखे के समस्या भइला पर भूँजल चना के संगे मिलल-जुलल भूंजा खाए के चाहीं। एकरा से आदमी कबज आ नबज दूनों आंवक में रहेला। भूँजल चना खइला से कुष्ट रोग ठीक होला। चना में फास्फोरस होला जवन होमोग्लोबीन बढ़ावेला। किडनी में बढ़ल नीमक के घटावेला। भूँजल चना देह का ग्लूकोज के सोख लेवेला। जवना से मधुमेह के रोग से मुक्ति मिलेला। रात में भूँजल चना के चबा के गरम दूध पिअला से सांस नली के बेमारी दूर होला। चेहरा पर चमक आ जाला। देह के मेटाबॉलिज्म बढ़ेला आ मोटापा कम होला। एकर फाइबर पाचन क्रिया के ठीक करेला आ कबज नियरा ना फटके। भूँजल चना में होला बिटामिन बी- 6 जवना से यादास्त बढ़ जाला आ दिमाग दुरुस्त होके सही दिसा में काम करेला। फास्फोरस दाँत के मजबूत करेला आ एकर कैल्शियम हड्डी के मजबूत बनावेला। खून के कमी दूर हो जाला। गुड़ आ भूँजल चना से प्रोटीन मिलेला। मसल्स पावर बढ़ेला। चना में जिंको होला जवना के सेवन से देह आ चेहरा पर चमक आ जाला। एकर पोटैशियम हार्ट अटैक से बचावेला। एकर आयरन एनीमिया से बचावे में मददगार साबित होला। एह तरह से भूँजा खाए के अनेक फायदा बा।

हमरा समझ से आदमी भूँजा खाइल तबे से चालू कर देले होई जब ऊ जंगल में पेड़-पौधा , नदी-झरना, पर्वत-पहाड़ सहित अहिंसक-हिंसक जनावरन के बीच प्राकृतिक जीवन जीअत होई। जंगल में दहकत दावानल में जब अन्न के दाना जर-भून जात होई आ ओकरा सोन्हाई के सवाद आदमी का मिलल होई। काहे कि भूँजा-सतुआ के चर्चा भारतीय साहित्यन में खूब मिलेला।

सांच पूछीं त आपन भारत आदि काल से प्रकृति पूजक आ खेती-किसानी संस्कृति के जीए वाला उत्सव धर्मी देस रहल बा। इहाँ बरमहल परब-तीज-तेवहार मनत रहेला आ ओह सब के सम्बन्ध कवनो ना कवनो रूप से प्रकृति, पेड़-पौधा, नदी-परबत, पवन-पावक, खेती-किसानी से उपजल फसल से मिलत आनंद-उत्साह आ मौसम के बदलाव-प्रभाव से होला। हमनी किहाँ पहिले रबी के फसल फागुन के अंत आ चढ़त चइत के आसपास तइयार हो जात रहे। जब से आदमी प्रकृति का संगे जादे छेड़छाड़ करे लागल तब से फसल तइयार होखे के समय आगे बढ़त चल गइल। खैर, हमनीं किहाँ नया साल के सिरी गनेस चइत महीना से होला आ फागुने से मौसमी उमंग-उत्साह मन-मिजाज के रंगीन बना देला। फागुन आवत-आवत पेड़-पौधा में नया-नया पत्ता, रंग-बिरंग के फूल आ तरह-तरह के फर-फल लागे लागेला। रबी फसल के बाढ़ देख के प्रकृति पूजक खेतिहर समाज के मन-मिजाज झूम उठेला आ ओकरा कंठ से फाग के राग निकसे लागेला। जवन इहाँ के सांस्कृतिक पक्ष के उजागर करेला। फागुन का पुनवांसी के सामुहिक रूप से फाग गावाला आ होली मनावल जाला। एकरा के बैदिक काल में ' वासंती नवसस्येष्टि पर्व ' कहल जात रहे। एकरा के ' शारदेय नवसस्येष्टि पर्व ' भी लोग कहत रहे। लोक में एकरा के नवाखानी, नवाखाई आ नवासी ग्रहण भी कहल जाला। माघ मास के बसंत पंचमी के दिने से फगुआ पर्व के सिरी गनेस हो जाला। रात में फगुआ के ताल ठोकाला। फाग के राग करेजा के आग आ मन के भाग जगा देला। अब हई देखीं, हमरा भूँजा मतलब भूनल अन्न के बारे में कहे के रहे आ कहाँ से कहाँ बात बहक गइल। खैर, गवें-गवें हमहूं पटरी पर आइए जाएब।

हम बहुत दिन से एह बात पर सोचत रहीं कि फागुन के पुनवांसी के मनावे वाला परब के होली काहे कहल जाला। त बहुत बाद में पता चलल कि फगुआ भा होली के एक दिन पहिले सम्हत में रबी फसल; जइसे - गेहूं, जौ, चना आदि के डांठ-छिलका सहित झोंकारल-भूँजल जाला, ओकरे छिलका के होलिका आ ओकरा भीतर का दाना के

होलक (प्रह्लाद) कहल जाला। छिलका रूपी होलिका जर-झोंकर जाले आ दाना रूपी प्रह्लाद बचा लिहल जालें। जवना के सेवन कइला से कफ, पीत आ बात के दोस सम होला। आयुर्वेद के अनुसार बसंत में होलक मतलब नवका अन्न के भूँज के खइला से कफ, पीत आ बात के दोस सम होखेला। एकरे के संस्कृत में कहल बा- ' वासन्तीय नवसस्येष्टि होलकोत्सव।' मतलब साल के पहिल महीना आरंभ होखे के पहिले भूँजा मतलब भूनन होलक मतलब अन्न खाए के पुरान परम्परा बा। जवना से भूँजा के महिमा उजागर होता। भारतीय साहित्य में साफ-साफ लिखल बा कि घास-फूस यानि तिनका के आग में भूँजल अधपाकल फली वाला अनाज (शमीधान्य) के 'होलक' चाहे 'होला' कहल जाला, जवना के खइला से कफ, पीत, बात, चर्बी, थकान सब का दोसन के समन होला।
' अर्द्धपक्वशमीधान्यैस्तृणभ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेदकफदोषश्रमापह:। '
बाकिर भूँजल 'होलक' मतलब 'भूँजा' के अकेले खाइल पाप ह। एह से मिल-बाँट के खाए के चाहीं-' केवलाघो भवति केवलादी।'
एह तरह से इहाँ भूँजे खाके नया साल में हमनीं डेग धरेनीं आ आपन मंगल करेनीं।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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