बोली आ भासा : डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



हर भासा बोली होले । जब भासा बोली ना रह जाए, मतलब लोक- बेवहार में ना रह के पोथी आ पढ़ाकुअन का गलथोथी तक सिमट जाले त ओकरे के 'कूप जल' भा मुअतार भासा कहल जाला। बोली गढ़ल कवनो पाणिनि आ पतंजलि का बूता के बात ना होला। बोली लोक- जीवनधारा में सालिग्राम मतिन सिरजाले आ जब उहे लोक बुद्धि, बिद्या, संस्कार-बिचार, ग्यान-बिग्यान-अन्तर्ग्यान से सोबरन होके ओह कुल्ह चीज के अपना बोली में बोले-लिखे लागेला त ओकरा बोली के दुनिया भासा कहेला।

जहाँ ले ब्याकरन के सवाल बा त ब्याकरन भासा के प्रकृति आ प्रवृति के अनुरूप लिखाला अपना से अधिका गैर भासा-भासी खातिर। अपना लोक (जन) के त मातृभसे होले। बाकिर ब्याकरन के नियम एतना जन कसा जाए कि फेर ऊ बोली ना रह जाए, ना त उहे नियम ओकरा मउअग के कारन हो जाई। जइसे जवन भासा आ ओकर ग्यान जुगन तक जन-जन के बोली में सहजे कहात-सुनात आ इयाद रखात आइल, उहे ब्याकरन का तंग नियमन भँवरी में अझुरा के लोक से कट-हट के परलोक के दुरूह भासा-ग्यान बन गइल। लिपि त बहुत बाद के अरजल चीज ह। बाकिर लिपियो भसे जइसन अपना लोक के प्रकृति आ प्रवृति उजागर कर देले।

भासा बिग्यान के अनुसार बोली आ भासा एक चीज ह। भासा भा बोली अपना इच्छा के अनुरूप ध्वनि प्रतीकन के ऊ बेवस्था ह, जवना के माध्यम से लोक भा जन-समुदाय भा खास समाज के आदमी आपुस में भाव-बिचार के लेन-देन करेलें। सपीर 'लैंग्विज' में लिखले बाड़न- 'टू द लिग्विंस्ट देयर इज नो रीअल डिफ्फेरेंस बिटवीन डाएलेक्ट एंड ए लैंग्वेज।' पेई भासा बिग्यान कोस में लिखले बाड़न - 'देयर इज नो इंसट्रिंसिक डिफ्फरेंस बिटवीन लैंग्वेज एंड डायलेक्ट।'

अइसे जहाँ बोली लोक सरोकार के चलते भासा के तुलना में अधिका सहज, सरस, स्वाभाविक आ जीअतार होले, उहँवे मानकता, स्वायतता आ आधुनिक भाव-विचार आ जुगबोधी अभिव्यक्ति के चलते बोली से भासा के मान-बराई बढ़ जाला। बोली के बेवहार असीम अनौपचारिक होला त बोली से भासा बनला पर ओकर बेवहार ससीम औपचारिक। मानकीकरण के अभाव में बोली के भासा के तुलना में स्थानीय रूप-भेद अधिक होला। ओकर कई गो अंतःक्षेत्रीय उपबोली होले त उहें बोली भासा के रूप लेते अंतर्क्षेत्रीय हो जाले। बोली बोलचाल आ मौखिक (श्रुति-स्मृति) लोक साहित्य प्रधान होले आ उहें बोली जब अपना जनता के शैक्षिक, शासनिक-प्रशासनिक, साहित्यिक-सांस्कृतिक, बैचारिक-बैग्यानिक आ आर्थिक उन्नति के पाके ओकरा अभिव्यक्ति के माध्यम बनले त भासा कहाले। दुनिया में सम्मान पावेले। बोली सुसंस्कृत आ परिनिष्ठित होके भासा बन जाले, बाकिर भासा से बोली पैदा ना होले। फेर जब पढ़ुआ-लिखुआ लोग ओह भासा के ब्याकरन के कठोर-कड़ा नियम में बान्ह के लोक से दूर के चीज बना देलन त फेर लोक में सहज-स्वाभाविक मुखसुखी गोमुखी प्रकृति आ प्रवृति के हिसाब से अपना बेवहार के बोली आकार लेवे लागेले।

कवनो बोली कमजोर, कंगाल भा बरियार ना होखे। बल्कि कमजोर, कंगाल आ बरियार होलें ओकर बेवहार करेवाला जन, जन समुदाय, समाज आ जाति-प्रजाति। बोली-भासा त उनका विकास आ ओकरा विकास के प्रति उनका लगन-मेहनत के बदौलत दुनिया पर छा जाले भा जमीन पर आ जाले।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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