पाइथागोरस से स्वप्नवार्ता - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



नउवाँ-दसवाँ में पाइथागोरस के प्रमेय पढ़ले रहीं। गुरु जी खूब मनोयोग से पढ़ावस। कबो पल्ले पड़े आ कबो नाहियो पड़े। कबो ब्लैक बोर्ड पर जाके प्रमेय सिद्ध कर दीं स त पीठ ठोकस आ कबो सिद्ध ना होखे त सीसो का डंटा के तरहथी पर ताबड़तोड़ हुम्चउआ पड़े। एने आके जब ईसा से ८०० साल पहिले के भारत के महान गणितज्ञ, दार्शनिक आ धर्मगुरु बौधायन के शुल्ब सूत्र का ओह प्रमेयन के जाने के मिलल जवन यूनानी गणितज्ञ का कई प्रमेयन से हू-ब-हू मिलत रहे त हम अचरज में पड़ गइनीं। बौधायन के प्रमेय बा - 'दीर्घास्याक्षणया रज्जु: पार्श्वमानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयांकरोति।।'

मतलब, एगो आयत के विकर्ण ओतने क्षेत्र एकट्ठा बनावेला जेतना कि ओकर लम्बाई आ चौड़ाई अलग-अलग बनावेलें।

हम पाइथागोरसो में इहे प्रमेय पढ़ले रहीं। फेर हम बौधायन आ पाइथागोरस के गुन-धुन में पड़ल-पड़ल कुछ सोचते रहीं कि हमार कब आँख लाग गइल, पते ना चलल। फेर सपना में देखऽतानी जे एगो खूब लम्बा-चौड़ा बुढ़ आदमी जेकर दाढ़ी आ मोछ खूब उज्जर रहे। देह पर उजरे चद्दर ओढ़ले सामने खड़ा मुस्का रहल बा। हम कवनो महान व्यक्ति के आगमन मानके माथ नवावत पूछलीं- 'अपने के हईं?'

एह पर ऊ मुस्कात बोललें- 'पाइथागोरस'। हम त दंग रह गइनीं। हम मुँह से कुछ कढ़ाईं कि ओकरा पहिले उहांका बतावे लगनीं कि 'तूं कए दिन से हमरा आ बौधायन जी के लेके माथापच्ची कइले बाड़ऽ त आज हम छछाते सब कुछ बतावे खातिर हाजिर बानी। पूछऽ हमरा बारे में का का जाने के चाहऽ तारऽ?' अब हम अहथिर हो गइल रहीं आ मने मन इतरात कहनीं- 'चलऽ। रोगिया का भावे से बैदे फुरमावे'। हम पहिलके सवाल कइनीं- 'राउर प्रमेय आ भगवान बौधायन के प्रमेय एके कइसे बा?'

एह पर पाइथागोरस बोललें - 'बौधायन जी हमरा से दू सौ से कुछ अधिके बरिस पहिले भारत में पैदा भइल रहस जे सिद्धार्थ गौतम बुद्ध से डेढ़ पौने दू सौ साल पहिले जनमल रहस। बौधायन के बारे में हमार गुरु थेल्स बतवले रहस जे सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के समकालीन रहस। हम अपना गुरु थेल्स से प्रभावित हो के तीस बरिस का उमिर में ग्यान का खोज में फारस, बेबीलोन, मिश्र, अरब होते भारत पहुँचल रहीं। तबे मगध में एगो बौद्ध मतावलंबी से बौधायन का ज्यामितीय-रेखागणितीय सूत्रन के जाने समुझे के मौका मिलल रहे। फेर इटली लौट के गुरु थेल्स के सहयोग आ देखेरख में बौधायन का प्रमेयन के आधार पर आउर प्रमेयन के सिद्ध कइनीं। फेर गुरु थेल्स के विद्वान शिष्य अनेक्जिमेंडर के आपन गुरु बना के गणित के आउर गंभीर अध्ययन करेके सौभाग्य प्राप्त भइल।'

एह पर हम उनका आ उनकरा जीवन यात्रा के बारे में जाने खातिर पूछनीं - ' अच्छा, रउरा प्रारंभिक जीवन यात्रा से लेके आखिर तक के कुछ मुख्य मुख्य बात सकेनीं? '

ई सवाल सुन के ऊ मुस्कुरात बोललें- 'काहे ना, आरे हमार जनम एशिया माइनर का किनारे पूर्वी ईजियन में एगो यूनानी द्वीप सोमास में ईसा पूर्व ५८०- ५७२ में भइल रहे। हमार माई पयिथिअस सोमास के रहे वाली रही आ बाबूजी मनेसार्चस लेबनान के टायर व्यापारी रहस। ऊ रत्नो के व्यापार करत रहस। हम तीन भाई बहिन रहीं। हमरा पत्नी के नाम थेना रहे जेकरा से हमरा दूगो बेटी भइली स जवन हमरा विचार, धार्मिक अभियान आ इस्कूल का विधि-बेवस्था में काफी मदद कइल लोग। हमार पूरा बचपन सोमास में बीतल। कुछ सेयान भइनीं त अपना बाबूजी का सङे व्यापारिक यात्रा पर सीरिया गइनीं। हमरा बाबूजी का हमरा शिक्षा पर बचपन से ध्यान रहे। उनकर मत रहे कि आदमी जिनगी में कवनो काम शिक्षित भइला पर करी त सुबेवस्थित आ विवेक का सङे करी। इहे सोच के ऊ सीरिया में हमरा पढ़ाई खातिर शिक्षक के इंतजाम कइलें। एही दरम्यान इटली जाए के मोका मिलल। उहंवे होमर के कविता आ वीना के नाटक पढ़े के मिलल। कुछ दिन शल्डिया में रह के उहाँ के विद्वान लोग बहुत कुछ जननीं-सिखनीं। हमरा के दर्शनशास्र पढ़ावे वाला पहिल गुरु रहलें सयरस के फेडेसायडेस। जब हमार उमिर अठारह-बीस साल के रहे त हमरा के पढ़े खातिर गणित आ अंतरिक्ष विज्ञान के वयोवृद्ध विद्वान थेल्स के आ उनकर सुयोग्य शिष्य अनेक्जिमेंडर के पास भेजल गइल। एह दू गुरु से पढ़ला के बाद हमरा गणित, अंतरिक्ष विज्ञान, ज्योतिष, संगीत आ दर्शनशास्र में काफी रुचि बढ़ गइल। एही लोग का सलाह से हम ज्ञान का खोज में फारस, बबिलोन होत भारत के मगध-कोसल इलाका में पहुँचल रहीं। उहँवे बौधायन का शुल्ब सूत्र के पढ़े के मिलल। उनका ज्यामितीय आ रेखागणितीय सूत्रन के बतावे- सुलझावे आ बढ़ावे में हमरा गुरु थेल्स आ अनेक्जिमेंडर के बहुत लमहर सहयोग रहल बा। बल्कि हम ओही लोग का ज्यामितीय आ अंतरिक्ष विज्ञान सम्बन्धी सिद्धांतन के आउर आगे बढ़इनीं।'

अपना गुरु थेल्स आ अनेक्जिमेंडर प्रति उनका अगाध सरधा-भक्ति-भावना के देख के ओह लोग का बारे में कुछ आउर जाने के इच्छा व्यक्त कइला पर पाइथागोरस बतवलें कि 'हमार गुरु थेल्स भारत के सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जोड़ा-पाड़ी के रहस। गुरु थेल्स (६२४-५५० ई. पूर्व), थेल्स के शिष्य हमार गुरु अनेक्जिमेंडर (६११-५४७ ई. पूर्व) आ महान विद्वान ऐनेक्सिमिनिज (५८८-५२४ई. पूर्व) तीनों जनें सृष्टि का मूल तत्व के बारे में आपन आपन विचार देले बा लोग। तीनों जना के मत ई बा कि मूल तत्व एके बा आ ऊ भौतिक बा। गुरु थेल्स जल के, गुरु अनेक्जिमेंडर अव्यक्त प्रकृति के आ ऐनेक्सिमिनिज वायु के मूल तत्व के पद दिहलें। हर भौतिक पदार्थ में गुन आ मात्रा प्रत्यक्ष दिखाई देला। बाकिर आइओनिया के विद्वान लोग गुन पर ज्यादे ध्यान दिहल आ मात्रा के उपेक्षा कइल। तब हम अपना अध्ययन के आधार पर मात्रा के सत्ता के तत्व समझनीं आ साबित कइनीं कि मात्रा के जाँच इकाई का नींव पर होला आ ई संख्या के आधार ह। संख्या सत्ता के तत्व ह। एह तरह से अमूर्त दार्शनिक विवेचन में प्रविष्ट भइल। सांच मानीं त सृष्टि में अनुरूपता आ सामंजस्य हर ओर दिखाई देला। ई अनुरूपता गायन में प्रसिद्ध होला आ संख्या के तुल्यता राग के आत्मा ह। नक्षत्र अपना गति से मधुर ध्वनि पैदा करेलें। बाकिर हमनीं सुन ना सकीं। काहेकि ओकर तीव्रता हमनीं का सुने के शक्ति का सीमा में ना आवे।'

यूनान में एगो गणितज्ञ, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ,, धार्मिक आंदोलन के संस्थापक आ सफल शिक्षक के रूप में राउर तबो सम्मान रहे आ आजुओ सउँसे यूरोप रउरा के ' संख्या के जनक ' के रूप में सम्मान देला। अब अपना अलावे अपना धार्मिक आंदोलन के बारे में, अपना इस्कूली शिक्षा-बेवस्था आ विचार के बारे में बतावल जाव। हमरा एह जिज्ञासा के समाधान खातिर ऊ बतवलें - 'ईसा से ५३२ बरिस पहिले सामोस का अहंकारी अत्याचारी राजा के हस्तक्षेप आ अत्याचार से आजिज होके हम इटली चल गइनीं। उहाँ ईसा से ५२९ बरिस पहिले क्रोटोन में एगो इस्कूल खोलनीं। जवना में तीन सौ विद्यार्थी अंकगणित, ज्यामिति, ज्योतिष विज्ञान, आ संगीत के अध्ययन करस। हम उहँवा अपना शैक्षिक, बौद्धिक आ धार्मिक अभियान के माध्यम से क्रोटोन का जनता का सांस्कृतिक आ धार्मिक जीवन में सुधार करेके ईमानदार पहल कइनीं। उहाँ का नागरिक के सदाचार के पाठ पढ़ावे खातिर अपने खुद ओह पर अमल करके आगे बढ़नीं। हमरा अनुयायियन के सभे पाइथागोरियन कहत रहे। हमरा इस्कूल के नियम उहाँ का लोग के मुताबिक बहुत कठोर रहे। हमरा इस्कूल के विद्यार्थी धार्मिक शिक्षा, सामान्य भोजन, व्यायाम, पठन आ दार्शनिक अध्ययन से युक्त जीवन जीयत रहलें। हमरा अनुसार संगीत आदमी का जीवन खातिर बहुत जरूरी चीज ह। हमार शिष्य अपोलो त हमरे साथे भजन गावत रहलें। हम शरीर आ आत्मा के इलाज बीना बजा के दूर कर देत रहीं। विद्यार्थी लोग का आपन याद्दाश्त बढ़ावे खातिर सूते का पहिले कविता पढ़ल जरूरी रहे। हमहूं विद्यार्थी जीवन में अपना गुरु जी लोग से बहुत सनेह पवले बानीं। इस्कूल में हमार शिक्षक लोग कबो कबो हमरा जिज्ञासा के सांत ना कर पावत रहे। बाद में हमरा जीवन में बड़ा परिवर्तन भइल। हमार ई साफ मत रहे कि हर आदमी के पवित्र जीवन बितावे के चाहीं। पवित्र जीवन के जरिए ही आत्मा के एह देह से मुक्त कइल जा सकेला। आदमी का आग पर तलवार से प्रहार ना करेके चाहीं। मतलब - क्रोधित आदमी का सङे कठोरता से भा क्रोधित होके बात-बेवहार ना करे के चाहीं।'

सबसे अंत में उनका से हमार सवाल रहे कि अइसे त रउरा मरला के दू सौ साल बाद रोम के सीनेट में राउर भव्य मूर्ति लगावल गइल आ एगो गणितज्ञ के रूप में यूनान के महानतम व्यक्ति होखे के सम्मान दिहल गइल, बाकिर रउरा के देस निकाला के सजा काहे दिहल गइल?

हमरा एह सवाल के सुनके ऊ कुछ असहज जइसन लगलें। बाकिर बोललें कि 'जवन शिक्षा चाहे विचार हम देस का नागरिक के जीवन सुधारे खातिर देत रहीं ओकरा के जमीन पर उतारे खातिर राजनीति के क्षेत्र में पाँव बढ़वनीं। एकरा बाद बरिसन से राजनीतिक जगत में कब्जा जमवले लोग हमार विरोध करे लागल आ कई गो अनर्गल आरोप लगा के देस निकाला के सजा दिलवावल। हम मेटापोटम आ गइनीं , जहाँ अस्सी-पचासी बरिस के अवस्था में हमार निधन हो गइल।'

पाइथागोरस के अतना बात सुनते हमार नीन टूट गइल। जवना के हमरा आजुओ अफसोस बा।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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