भोजपुरी गीत-संगीत की धवल धारा : डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'



संस्मरणात्मक आलेख :
डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी से मेरा परिचय भोजपुरी-सेवी साहित्यकार के नाते सन् उन्नीस सौ निन्यानबे ई. के एक 'भोजपुरी कवि सम्मेलन' में हुआ था। कवि सम्मेलन को संचालित करने वाले महानुभाव ने काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए जब इनका परिचय देना प्रारंभ किया तो मुझे हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (उत्तर प्रदेश) द्वारा सन् उन्नीस सौ पंचानवे ई. में आयोजित 'हिन्दी दिवस' और उस अवसर सम्पन्न विविध संगोष्ठियों का स्मरण हो आया। इधर डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी अपने काव्य-पाठ के निमित्त अपने होठों पर हल्की मुस्कान लिए शालीनता के साथ जैसे ही माइक के पास जाकर खड़ी हुईं कि पूरा पंडाल करतल-ध्वनियों से गूंज उठा। बड़े ही विनम्र भाव से बोलीं - 'भोजपुरी के एगो छोट गीत सुना दे तानी।' फिर पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मंच और पंडाल में बैठे काव्य-रसिकों के आग्रह पर इन्हें एक नहीं, तीन-तीन गीत सुनाने पड़े थे। जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां आज भी मैं यदा-कदा गुनगुना लेता हूँ। आप भी गुनगुनाइए -

' धीर मन के कतना धरावत रहीं,
पीर हियरा में कबले बसावत रहीं।
गिन-गिन दिनवाँ जे भइलें बरिसिया
असरा भइल ना अँखिया में निनियाँ
नीर पलकन में कबले छुपावत रहीं
धीर मन के कतना --------------- '

अपनी प्रस्तुति के पश्चात् तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ये फिर उसी तरह अपने होंठों पर हल्की मुस्कान लिए शालीनता के साथ अपने स्थान पर जाकर बैठ गईं। कवियों का काव्य-पाठ चलता रहा और मैं फिर उसी हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा इलाहाबाद में आयोजित सन् उन्नीस सौ पंचानवे ई. के हिन्दी दिवस समारोह के उस प्रसंग को याद करता रहा जिसका सम्बन्ध डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी से था।

उस समारोह में पूरे भारतवर्ष के ख्यातिलब्ध हिन्दी-सेवी कवि-साहित्यकार, भाषाविद् आदि सम्मिलित हुए थे। मैं उन सबों में संभवतः सबसे कनिष्ठ था। इसलिए वैचारिक-संगोष्ठी के साथ-साथ काव्य-गोष्ठी में भी सभी बड़ों का अकल्पनीय स्नेह पाकर मैं गदगद था। काव्य-गोष्ठी सम्पन्न होने के पश्चात् मैं जिस कमरे में अपने दो युवा कवि मित्र के साथ ठहरा हुआ था उसमें स्नेहाशीष देकर प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से जो दो वरिष्ठ कवि- साहित्यकार पहुँचे, उसमें से एक थे हिन्दी, भोजपुरी और मगही के सुख्यात वयोवृद्ध कवि-साहित्यकार श्री सुर्य कुमार शास्त्री जी और भोजपुरी-हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, गीतकार और गजल लेखक पाण्डेय आशुतोष जी।

पहले हम सब एक दूसरे से परिचित हुए और उस कमरे में काव्य-पाठ का एक और दौर चला। फिर संवाद के क्रम में पाण्डेय आशुतोष जी ने वयोवृद्ध कवि-साहित्यकार सूर्य कुमार शास्त्री जी का विशेष परिचय कराते हुए बताया था कि 'शास्त्री जी मगध क्षेत्र के हैं। इनका पैतृक गांव फतेहपुर है जो पटना के पास है। ये तुम्हारे सारण जिला के अन्तर्गत सोनपुर में रेलवे विभाग के अधिकारी हैं। अब इन्होंने सोनपुर में ही अपना घर बना लिया है जिसका नाम इन्होंने 'आभा धाम' रखा है। इनकी दो-दो पुत्रियां सुभद्रा वीरेन्द्र और सविता सौरभ भोजपुरी और हिन्दी की बहुत ही लोकप्रिय कवयित्री और गीतकार हैं। इनकी दोनों पुत्रियों को बचपन से इनका और इनके आत्मीय साहित्यकार मित्रों का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। दोनों बचपन से ही एक बड़े ही प्रभावी साहित्यिक परिवेश में पली-बढ़ी हैं। सुभद्रा वीरेन्द्र सविता सौरभ से बड़ी है। दोनों का सम्बन्ध साहित्य के साथ-साथ संगीत से भी है।' और भी बहुत सारी बातें हुईं। फिर वे दोनों अपने-अपने निर्धारित कमरे में चले गए और मैं अपने सौभाग्य पर इतराता रहा।

मैं सन् उन्नीस सौ छियानवे के नवम्बर महीने में भोजपुरी के व्याख्याता के रूप में जब बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कालेज में अपना योगदान दिया तब भोजपुरी-सेवी अभिभावक कवि-साहित्यकार जनों, संपादक-संगठनकर्ता महानुभावों का और स्नेहाशीष मिलना प्रारंभ हुआ। विशेषकर श्रद्धेय पाण्डेय कपिल जी और अक्षयवर दीक्षित जी ने भोजपुरी के कई स्तरीय पुस्तकों एवं पत्रिकाओं डाक के माध्यम से मुझ तक पहुँचवाया। पाण्डेय कपिल जी द्वारा सम्पादित 'भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका' के कई अंकों में डा. सुभद्रा वीरेन्द्र जी के गीत पढ़ने को मिले। परन्तु, इनको विषय में विशेष रूप से जानने का माध्यम बना अक्षयवर दीक्षित जी द्वारा सम्पादित पुस्तक 'भोजपुरी-सेवी महिला'। जिसमें डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी पर स्वयं पुस्तक के सम्पादक अक्षयवर दीक्षित ने अपना आलेख 'भोजपुरी गीत आ संगीत के सफल साधिका श्रीमती सुभद्रा वीरेन्द्र' शीर्षक लिखा है। जिससे ज्ञात हुआ कि डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी बिहार विश्वविद्यालय से बी. एस-सी., बी. एड. करने के पश्चात् प्रयाग संगीत समिति से स्वर-संगीत में 'संगीत प्रवीण' और मिथिला विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हैं। इन्होंने संगीत में ही पीएचडी उपाधि प्राप्त किया है। डॉ. सुभद्रा जी के नाम के साथ जो वीरेन्द्र उपनाम जुड़ा है वह इनके सुखद और सुसंस्कृत भारतीय दाम्पत्य जीवन को परिलक्षित करता है। मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान 'अनुग्रह नारायण सिंह कालेज (ए एन कालेज) पटना के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के यशस्वी प्रोफेसर और हिन्दी भाषा-साहित्य के निष्णात विद्वान डॉ. कुमार वीरेन्द्र जी इनके पति हैं जो अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् हिन्दी सहित कई और भारतीय भाषाओं के साहित्यों के अध्ययन और आलोचना कर्म में लगे रहते हैं। सुभद्रा जी ने अपना वीरेन्द्र उपनाम अपने पतिदेव से साधिकार प्राप्त किया है।

डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी प्रारंभ में पटना के एक महिला महाविद्यालय के संगीत विभाग में कुछ समय तक व्याख्याता और अध्यक्षा के रूप में कार्यरत थी और उसके पश्चात् इन्होंने जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (सारण) के अन्तर्गत डॉ. पी. एन. सिंह डिग्री कालेज, छपरा के संगीत विभाग की व्याख्याता और अध्यक्षा के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के पश्चात् अवकाश ग्रहण किया है।

सन् उन्नीस सौ निन्यानबे के बाद भोजपुरी भाषा केन्द्रित साहित्यिक आयोजनों में मेरी मुलाकात डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी से अक्सर होती रही, जिसमेें मुझे इनका अनुजवत् स्नेह मिलता गया और मेरे लिए ये भी बड़ी दीदी के रूप में आदरणीय-पूजनीय हो गई। फिर मैं प्रोफेसर डॉ. कुमार वीरेन्द्र जी का भी स्नेह-पात्र होकर इनके परिवार का एक सदस्य ही हो गया। जब भी इनके घर जाता तो दीदी के गीत सुनता और सर का साहित्य तथा आलोचना पर व्याख्यान। सर की और दीदी की कई प्रकाशित साहित्यिक कृतियों को पढ़ने और समृद्ध होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। फिलहाल मुझे दीदी अर्थात् डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी की प्रकाशित साहित्यिक कृतियों एवं विशेषकर भोजपुरी गीतों पर ही केन्द्रित होना है।

सन् उन्नीस सौ संत्तानवे के पूर्व डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक 'आरोह- अवरोह' प्रकाशित हुई थी जिसमें साहित्य, संगीत और कला विषयक कई महत्वपूर्ण हिन्दी निबंध संग्रहित हैं। 'आरोह-अवरोह' के पश्चात् इधर इनकी कई साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन हुआ है ; यथा - इचिको ना लउके (भोजपुरी गीत-संग्रह) - सन् १९९७, राग-ऋचा (हिन्दी गीत-संग्रह) - २०००, राधा गावे मल्हार (भोजपुरी गीत - संग्रह) सन् २००२, तहरे नाम (भोजपुरी गजलिका-संग्रह) सन् २००८, गंध - ऋचा (हिन्दी गीत-संग्रह) सन् २०१७, 'भारतीय संगीत : कल, आज और क ' ( पी-एच. डी. उपाधि के लिए लिखित शोध-प्रबंध का यत्किंचित परिवर्धित रूप) - सन् २०१९ और रस-गंध (भोजपुरी गीत-संग्रह) सन् २०२१ ।

इनके भोजपुरी गीत-संग्रह 'सुहागिन संझिया' और भोजपुरी कहानी-संग्रह 'उजास के आस' अभी प्रकाशनार्थ प्रेस में है।

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से 'चित्रलेखा सम्मान', रोयाल नेपाल एकेडमी, नेपाल एवं संस्कार भारती, विक्रमपुर - सुल्तानपुर ( उत्तर प्रदेश ) से 'जायसी सम्मान', हिन्दी संस्थान, मथुरा (उत्तर प्रदेश) से 'महादेवी वर्मा सम्मान' आदि के अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर के सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित व पुरस्कृत डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी की प्रकाशित कृतियों के आधार पर कोई भी साहित्यानुरागी अथवा साहित्य का मर्मज्ञ सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि इनका जीवन गीतमय तथा संगीतमय है। यह प्रायः सभी को ज्ञात है कि रागात्मक-लयात्मक गेय भावाभिव्यक्ति की शक्ति एवं सांगीतिक स्वरों की साधना सबको सहज ही सुलभ नहीं होती। इन दोनों का सम्बन्ध सामान्य जनों के मस्तिष्क से न होकर विशेषतः सहज, सरल, संवेदनशील, रागात्मकता से ओतप्रोत चेतना-सम्पन्न कोमल भावना प्रधान हृदय वालों से ही होता है। जिनका सम्बन्ध साहित्य और संगीत से होता है उन्हें ही आचार्य गणों ने पूर्ण मनुष्य माना है। प्रकारांतर से भर्तृहरि ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए लिखा है - 'साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ विषाणहीन:।'

एक संस्कृत के आचार्य ने संगीत और साहित्य की तुलना माँ सरस्वती के दोनों स्तनों के दूग्धामृत से करते हुए मुग्धकंठ से प्रशंसा करते हुए लिखा है-

'संगीतमपि साहित्यं सरस्वत्या स्तनद्वयम् ।
एकं अपार मधुरं अन्यत् आलोचनामश्रतम्।।'

साहित्य और संगीत कला के बहुत महत्वपूर्ण प्रकार हैं। जहाँ साहित्य का सम्बन्ध शब्द से है वहीं संगीत का सम्बन्ध नाद से है। शब्द और नाद दोनों को ब्रह्म कहा गया है। नाद का सम्बन्ध मनुष्य के हृदय और कंठ से है तो शब्द का सम्बन्ध भी इसी हृदय और कंठ से होता है। काव्य-साहित्य की गीत-विधा का सम्बन्ध तो भावमय हृदय से निश्चित ही होता है जो साहित्यकार-गीतकार के कंठ और होंठों से नि:सृत होकर पूरे परिवेश को साहित्यमय व संगीतमय बना देता है। गीत और संगीत दोनों कर्णेंद्रिय हैं। दोनों में भावोत्तेजना की अपार संभावनाएं होती हैं। गीत प्रभाववृद्धि के लिए संगीत का और संगीत अर्थबोध के लिए गीत का सहारा लेते हैं। गीत का प्रभाव दीर्घव्यापी होता है तो संगीत का प्रभाव तीव्रगामी होता है। जब दोनों के सम्यक्- संयोग के श्रवण से व्याधि-विकारग्रस्त मनुष्य का हृदय भी निष्कलुष और आह्लादित हो उठता है। ऐसी अवस्था में डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी के भोजपुरी गीतों के पाठक एवं संगीतमय गीतों के श्रोता सहज ही पहुँच जाते हैं। जिनके विषय में अनेक अवसरों पर कई स्वनामधन्य काव्य-रसिकों ने अपने-अपने मन्तव्य दिए हैं।

सुभद्रा जी के कंठ से इनके गीतों को सुनकर भोजपुरी- हिन्दी के महान गीतकार मोती बी. ए. जी को हठात् डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन' की कविता के एक चरण स्मरण हो आया था -

'सुरीले कंठों का अपमान,
जगत में कर सकता है कौन?
स्वयं लो प्रकृति उठी है बोल,
विदा कर अपना चिरव्रत मौन।।'

भोजपुरी अंचल की एक विरहन की विरह वेदना को डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी ने जो शब्द और स्वर दिया है उसे स्वयं मोती बी. ए. जी भी गनगुनाने लगते हैं -

'रउरे असरा में जिनिगी भुलाइल रहे
जइसे फुनगी पर मयना टँगाइल रहे
ओठ सी-सी के जीयत गइलीं हँ हम
माहुर हँसि-हँसि के पीयत गइलीं हँ हम
अँखिया में दरदिया के सागर रहे
जइसे अँसुवन के रहता लुकाइल रहे
रउरे असरा में जिनिगी भुलाइल रहे---।'

इनके गीतों में प्रेम, करूणा, ममता, वेदनामय कोमल भाव आदि अपने सम्यक् शब्द-प्रयोग के माध्यम से ऐसे प्रकट होते हैं कि उसके भाव-पक्ष और कला-पक्ष में एक दूसरे पर भारी पड़ने लगते हैं।

डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र अपने गीतों के माध्यम से पढ़ने-लिखने से अधिक अपने प्रियतम के प्रीतिकर पत्र को महत्व देकर संतकवि कबीर के 'ढ़ाई आखर प्रेम का' वाले दोहे का अपने अलग अंदाज में स्मरण कराकर भोजपुरी की अभिव्यंजना शक्ति से पाठकों एवं श्रोताओं को परिचित कराती हैं -

'हमरे पढ़ले-लिखले कुछ अउरि बात बा।
तहरे प्रीति के पाती पढ़ल अउरि बात बा--- '

इनके गीतों पर अपने भावोद्गार व्यक्त हुए विंध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी जी लिखते हैं कि हमको तो लगता है कि सुभद्रा जी स्वयं कविता हैं। इस प्रसंग में त्रिपाठी जी को एक कविता की कड़ी याद आती है -

'सरस सुमन मँडरात अलि,
न झुकि झपटि लपट्यात।
दरसत अति सुकुमारता,
परसत मन न पत्यात।।'

आगे त्रिपाठी जी सुभद्रा जी के गीतों की व्याख्या और उसमें कुछ कमियों को खोजने को लेकर अपने को वैसे ही मानते हैं जैसे किसी साग बेचने वाले नीरस व्यक्ति को कोई मणि परखने और बेचने-खरीचने को कह दे - 'साग बनिक मनि गुन गन जइसे।'

डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी के गीतों में अभिव्यक्त ममता, करुणा, प्रेम, मिलन-विरह, पीड़ा-वेदना, टुटन-घुटन, आशा-निराशा आदि की सहज-स्वाभाविक उपस्थिति को पाकर पाठक एवं श्रोता इनकी तुलना मीरा बाई और महादेवी वर्मा से करते हैं। पाठक-श्राताओं के अपने लिए ऐसे भावोद्गार पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए सुभद्रा जी अपने भोजपुरी गीत-संग्रह 'राधा गावे मल्हार' में अपनी बात लिखती हैं -

'हम हिन्दी आ भोजपुरी में गीत लिख तानी आ ओही में रम तानी। हमार भोजपुरी गीतन के पहिले संग्रह 'इचिको ना लउके' - एके भावकोण में अटकल-ठिठकल। जाने का भइल सभे कहे लगलन कि सुभद्रा जी भोजपुरी के महादेवी बाड़ी। जनिका दुख आ वेदना, पीड़ा आ त्रास से प्रेम बा। का कहीं उनहन के ? हम महादेवी ना हईं आ ना बने चाहबि। हम त सुभद्रा बानी आ सुभद्रा बनिके जीये चाहतानी। ईहे हमार सही पहचान ह।

उजास के आस बा। सहमल त बानी अबहियों बाकि बढ़े में हुलास बा। लत्तर डरत-डरत पसरि रहल बानी। अनगढ़ पाथर लेखा भार बनिके ना रहे चाहबि। मुदा मुरुत कइसे बनि पाइब ? मरुथल में कबो रतन ढ़ूँढ़तानी त कबो गहिर समुन्दर से मोती ढ़ूँढ़ि के निकाले चाहतानी। साँस-साँस में टीस, दरद आ तरास समाइल बा। सुनहर सपना तबो थाती हवे हमार। अनथक यात्री हइं हम। गंतव्य तय बा। एह विराट् विचित्र में हमहूँ एगो जतन-जुगुत बनि के चलि रहल बानी। कहे के त जाने केतना-केतना बा बाकि लीहीं आपन बात का बहाना से -

का रे कहीं हम आपन बात
जिनगी मिलल साँचो सौगात!
सुपली-मउनियाँ खेल बनाईं
गुड़िया-पुतरिया क बियाह रचाईं
कबो मछरी बनि बिछलत जाईं
दउरीं परिछाहीं के साथ ---------'

सुभद्रा जी के कंठ से उनकर जँतसार सुनके डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय जी भाव-विह्वल होके रो पड़ल रहलें। इनका जँतसार के एक- दू कड़ी रउरो सभे देखीं -

'अन्हियारी रतिया रामा, कड़के बिजुरिया रामा
चूएला छान्ही आ छपरिया ए राम।
ठिठुरल देहिया रामा, अझुरल केसिया रामा
अटकल कहवाँ मोर सनेहिया ए राम।
पियासल मनवाँ रामा, अखरल परनवाँ रामा
नित उठि कुहुकेले देहरिया ए राम।
मन के मनोरथ रामा, गंगा दहि गइले रामा
डूबि गइले जोगल बनिजिया ए राम।
घरवा में घूमे रामा, भुतवा-पिचसवा रामा
सेजिया पर लोटेले नगिनियाँ ए राम।
दिनवा जे बीतल रामा, बीतल बरिसवा रामा
बीति गइले सउँसे उमिरिया ए राम। '

डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी के भोजपुरी आ हिन्दी गीतों की धवल धारा में कोई काव्य-रसिक ही उतरकर आह्लादित और भावविभोर नहीं होता, बल्कि अरसिक भी गीतों के एक-एक शब्द एवं भावों के धार में बहने लगते हैं। यहाँ इनके सभी गीतों को और उनमें अभिव्यक्त विविध भावोद्गोरों को परोसना संभव नहीं है। किस रचना पर अपनी बात रखूँ और किसे छोड़ूँ मैं स्वयं निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। ऐसी अवस्था में मैं फिलहाल मृत्युंजय मिश्र 'अरुणेश' के 'मोती मानसर के' से चार पंक्ति उधार लेकर डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी के गीतों के विषय में अपना उद्गार प्रकट कर रहा हूँ -

'सभी गीत अपने ही तो हैं, किसे भला ठुकराऊँ?
सभी हृदय से ही निकले हैं, मीत किसे बिसराऊँ?
उर उद्गार उमड़ आया तो ये निर्झर फूटे हैं,
जी करता है एक एक को अंक भरूँ, दुलराऊँ।।'
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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