ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। चलनी के चालल सूपवा के फटकारल अपना के बता गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। ए मुखियाजी! रउआ त जेकरा-जेकरा दुअरा गईनी भात-भवदी के त छोडीं बातो-बतकही छोड़ा गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। ए मुखियाजी! रउरा त हाथ जोरि के दाँत निपोर के सबका के बुड़बक बना गईनी बाबू-बरुआ के महाभारत कराके झड़ुअन वोट बहार गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। ए मुखियाजी! रउरा त चापलुसन के वंस बढ़ा गईनी दुआरा के कुकुरन के भी बब्बर शेर बना गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। ए मुखियाजी! रउरा त जेकरा से ना बात-बतकही ओकरो से घीघीआ गईनी ढोंढ़ा-मंगरू छेदी-झगरू से छनही मे लाट लगा गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। ए मुखियाजी! रउरा त गली-नाली के का कहीं मुड़ेरवो भसा गईनी आवास के आसारा में त घरओ में जोन्हीं देखा गईनी ए मुखियाजी! रउरा त सभकर थाह लगा गईनी। सम्प्रति : उमेश कुमार राय ग्राम+पोस्ट - जमुआँव थाना- पीरो, जिला- भोजपुर (बिहार)
81. ए सुखारी चाचा: डॉ. हरेश्वर कटहर लेखा मुंह काहे लटकल ए सुखारी चाचा। लागता कि हार तोहरा खटकल ए सुखारी चाचा।। ताल के टोपरा बेंच बांच के लड़ल ह तूं बिधयकी। हरलह त पोंछिया तहार सटकल ए सुखारी चाचा।। भोरहीं भोरहीं तूं त दारु से करत रहलs ह कूल्ला। फुटानी के बरखा त अब चटकल ए सुखारी चाचा।। बहुत दिनन से डूबि डूबि के पीयत रहल ह पानी। लगता कि अबकी टेंगर अंटकल ए सुखारी चाचा।। राजनीति के छोड़s चस्का जा अब कीनs कटोरा। साधू चा के पिछवा चलs लटकल ए सुखारी चाचा।। 80. जाड़ दद्दू: डॉ. हरेश्वर फेर एहू साल बाड़े जाड़ दद्दू आइल बा कूहा के चद्दर में गांव लपेटाइल। दुअरा के कउड़ प लागता मजलिस महंगुआ के मेटा से सूटर खिंचाइल। सतुआ पीसात बाटे लिट्टी बनावे ला दादी खाति माटी के बोरसी पराइल। अंगनाई लिपात बा दुअरवा लिपाता गैंड़ा के खेतवा में कोबिया फुलाइल। पछेया के हवा चुभेला तीर जइसन हड़वा में हमरा बा जड़वा समाइल। 79. हमार सुगउ : डॉ. हरेश्वर हमार सुगउ हो हमार सुगउ हो हमार सुगवा चलि गइलs कवना देसवा हो हमार सुगवा। सवख आ सिंगार अब हम केकरा पर करम मीतवा केकरा पिरि...
कर जोरि बिनती करीला सुरसती मोरी मईया जी हे वीणापाणि! होखीं ना सहईया मोरी मईया जी। अज्ञान के अन्हरवा अंबिका लिखत बा बरबदिया सुर- ताल मतिया के माई हो होखत बा दुरगतिया डूबत बिया नदिया बीचवा नईया मोरी मईया जी। हम मुरुख अज्ञानी बानी ज्ञान के ज्योति जला दीं हमरी जेठ जिनिगिया मईया सुंदर फूल खिला दीं हे माहमाया! परत बानी पईंयां मोरी मईया जी। आरे आंखि अछइत ए अम्बे! भईल बानी आन्हर भरल बा जिनिगिया में मईया खाली डील- डाबर दीं ना कुल्हि मरजवन के दवईया मोरी मईया जी।
'सरभंग सम्प्रदाय' संत मत के एगो शाखा ह। जवना के सम्बन्ध कुछ विद्वान लोग अघोर पंथ से जोड़ले बा। कवनो मत भा पंथ से कोई शाखा तबे फूटेला, जब ओकरा व्यवहार, सिद्धांत आ आध्यात्मिक साधना के स्तर पर केहू विशेष प्रभावशाली प्रतिभा-सम्पन्न सिद्ध साधक अपना पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव ले आवेला आ ओकर शिष्य जमात ओकरे राहे आगे बढ़ेला। कवनो मत, पंथ भा सम्प्रदाय में बदलाव आ बढ़ाव के ई सनातन स्वाभाविक प्रक्रिया ह। वैदिक, उत्तर वैदिक, जैन, बौद्ध, सिद्ध, नाथ आ निरगुन-सगुन मत सब के क्रमवार विकास एही क्रम से भइल बा। कवनो नया पंथ भा सम्प्रदाय अपना से पुरान मत का प्रासंगिकता तत्वन के अपना समय-समाज के हित में अपना तौर तरीका के हिसाब से अपनावत आ ओकरा अप्रासंगिक चीजन के दरकिनार भा विरोध करत एगो नया स्वरूप में सामने आवत जाला। हं, एकर प्रवर्तक केहू प्रभावशाली चमत्कारी व्यक्ति आ ओकर आचार-विचार जरूर होला। ओह पंथ का नामकरण के पीछे भी कवनो ना कवनो चमत्कारी व्यक्ति भा ओकरा सिद्धांत के आधार होला। सरभंग सम्प्रदायो से इहे सिद्धांत जुड़ल बा। 'सरभंग सम्प्रदाय' के नाम आ अर्थ के लेके विद्वान लोग राय अलग-अलग ...
आत्म-संस्मरण: जिनिगी परत-दर-परत डॉ रंजन विकास के, आपन आ अपना लोगन के जिनगी के कुछ बहुमूल्य क्षणन के कहानी के नाँव ह- फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया, जेकरा के ऊ 'आत्म-संस्मरण' कहत बाड़े। उनका अनुसार- "हमार आत्म-संस्मरण 'फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया' में मन के उपराजल कुछुओ नइखे, बलुक जिनिगी में जे हमार देखल-भोगल जथारथ बा ओकरे के उकेरे के कोसिस कइले बानीं। साँच कहीं त पचरुखी एगो छोटहन कस्बा भइला के बादो हमरा ख़ातिर बहुते मनोरम, रमणीक आ खास रहल बा। एह जगह से हमार बचपन के सगरी इयाद आजो ओसहीं जुड़ल बा, जइसे पहिले रहे। पचरुखी आम बोलचाल के भाषा में पचरुखिया नाम से जानल जाला।" (आपन बात/14-15) भारतीयता के कई सुघर पहचान चिन्हन में से एगो इहो ह कि ऊ कबो अपना उद्भव-स्रोत, आपन ज'रि ना भुलाइ। भगवानो अवतार लेले त' सामान्य आदमी नियर कहेले- "भले लंका सोना के होखसु, हर तरह से अजाची, शक्ति आ सत्ता के शीर्ष प खाड़ होके विश्व-वैभव के चकचिहावत होखसु, हमरा जन्मभूमि अयोध्या के बरोबरी करे वाला स्थान सउँसे सृष्टि में कतहूँ नइखे। महतारी आ मातृभूमि सरगो से बड़ होली।" भौ...