भोजपुरी आलोचना के वर्तमान स्थिति: विष्णुदेव तिवारी

भोजपुरी साहित्य में आलोचना के स्थिति, साहित्य के अउरी दोसर विधा सब के तुलना में, ओइसन त नइखे जेकरा पर उतान होखल जा सके बाकिर अइसनो नइखे जेकरा से चितान होखे के नउबत आवे।

कोरोना संकट से हरान आ डेराइल- उबिआइल समय में, जब सब कार ठप रहे, भाषा आ साहित्य से जुड़ल लोग विभिन्न आभासियो माध्यमन के जरिए, साहित्य अउर ओकरा के रचे वाला साहित्यकारन के ऊपर कुछ नया ढँग से बात कइल। 'भोजपुरी मंथन', 'पचमेल', 'आखर', 'भोजपुरी: द सोल ऑव मिलियन्स', 'सारण भोजपुरिया समाज' जइसन कई डिजिटल पटल पर महत्वपूर्ण कार्यक्रम भइले स। 'पचमेल' के संस्थापक प्रो. पृथ्वीराज सिंह त' अपना पटल से जार्ज ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण पर बात शुरु कइले आ उनकरा भाषा सर्वेक्षण सम्बन्धी वॉल्यूम-5, खंड-2 के, जेकरा में बिहारी भाषा भोजपुरी, मैथिली आ मगही बोली के सम्बन्ध में बात बा, अनुवाद कइले आ किताब रूप में छपवले। क़िताब के नाँव ह "भारतीय भाषा सर्वेक्षण में भोजपुरी"। द्रष्टव्य बा कि ग्रियर्सन के एह महत्वपूर्ण कार्य के अब ले अनुवाद ना भइल रहे। भाषा सम्बन्धी एह किताब में ग्रियर्सन के व्यक्तित्व- श्रम, सोच, दृष्टि, अनुसंधानादि के विवेचन आ अनुवाद के पाद-टिपण्णियन में,अनुवादक के आलोचनात्मक नज़र के कुछ झाँक देखल जा सकत बा।

आलोचना के कुछ किताब नगीच-पास में भोजपुरी पाठकन के सामने अइली हा स, जे मेंं डॉ अशोक द्विवेदी के 'भोजपुरी रचना आ आलोचना'(2019), डॉ बलभद्र के 'भोजपुरी साहित्य: हाल-फिलहाल'(2020) आ डॉ ब्रजभूषण मिश्र के 'भोजपुरी साहित्य: परंपरा आ परख'(2021) प्रमुख बा। यद्यपि ई तीनों किताब एकरा लेखकन के द्वारा अलग-अलग समय पर रचाइल आलोचनात्मक लेखन के संग्रह हई स, इहनी के सरिहा के पढ़ला पर पहिले के साथ-साथ आजुओ के रचना आ आलोचना के बारे में ढेर महत्वपूर्ण जानकारी मिलत बा।

यदि कॉपी पेस्ट ना कइल गइल होखे आ सचहूँ मेहनत, समर्पण आ कुछ नया आ मौलिक ले आवे के संकल्प होखे त विश्वविद्यालय में होखे वाला शोधो भोजपुरी आलोचना के महत्वपूर्ण मानक हो सकत बाड़े स। ई शोध अब भोजपुरियो भाषा में हो रहल बा। भोजपुरी भाषा में भइल कई शोधन के जिकिर चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह अपना 'भोजपुरी इनसाइक्लोपिडिया भाग-1 में कइले बाड़े। पहिले ई शोध अँग्रेजी भा हिन्दिए आदि भाषा में होत रहे। डॉ अरूण मोहन 'भारवि' के भोजपुरी उपन्यासन पर आ डॉ ब्रजभूषण मिश्र के भोजपुरी प्रबंध काव्यन पर भइल शोध अइसने हवन स। "भोजपुरी पत्रकारिता आ समकालीन भोजपुरी साहित्य" पर डॉ वैरागी प्रभाष कुमार चतुर्वेदी के, हिन्दी में, कइल गइल शोध एही नाँव से 2019 में प्रकाशित हो चुकल बा। डॉ ब्रजभूषण मिश्र के शोध के संक्षिप्त रूप, भोजपुरी भाषा में, " भोजपुरी प्रबंधकाव्य: वस्तु आ शिल्प" नाँव से 'भोजपुरी अकादमी पत्रिका'(जनवरी-दिसंबर/वार्षिकांक/1995/) में प्रकाशित हो चुकल बा, जेकरा के उनका आलोचनात्म पुस्तक "कसउटी पर भोजपुरी कविता"(2008) में संग्रहीत कइल गइल बा। मूल शोधो, अद्यतन संशोधित- परिवर्द्धित होके, प्रकाशन खातिर तइयार बटुए।

आज भोजपुरी आलोचना में सक्रिय भा सक्रिय रह चुकल कुछ लोग में प्रो ब्रजकिशोर,डॉ गदाधर सिंह,बरमेश्वर सिंह, नगेन्द्र प्रसाद सिंह, प्रो शम्भुशरण सिन्हा, सूर्यदेव पाठक 'पराग', कन्हैया सिंह 'सदय', डॉ तैयब हुसैन 'पीड़ित', डॉ अशोक द्विवेदी, डॉ ब्रजभूषण मिश्र, डॉ शारदा पाण्डेय, आनंद सन्धिदूत,भगवती प्रसाद द्विवेदी,डॉ आसिफ रोहतासवी, जितेन्द्र कुमार, डॉ बलभद्र,डॉ सुनील कुमार पाठक, डॉ जयकांत सिंह, डॉ जीतेन्द्र वर्मा, दिलीप कुमार जइसन कई महत्वपूर्ण नाँव बा, जिनका से आलोचना के निछछ भोजपुरिया राह बने के उमेद बन रहल बा, हालाँकि भोजपुरी आलोचना के सीमा अबे पुस्तक-परिचर्चा, व्यक्ति-चर्चा भा कवनो रचना विशेष के लेके कइल गइल विचार अभिव्यक्ति तक सीमित बा आ इहो सब एगो बन्हल-बन्हावल, चलत चल आइल परिपाटी के अनुकरण अस जादा बा, अनुस्मरण अस कम।

बाकिर राह त' एहिजे से निकली!

सम्प्रति:
विष्णुदेव तिवारी, बक्सर, बिहार

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