काव्य - रसिक के विविध आयाम - प्रो. (डॉ.) जयकान्त सिंह 'जय'

जइसे कवि आ काव्य का विविध आयाम पर विचार भइल बा ओइसहीं ओह काव्य के आनंद लेवे वाला श्रोता आ पाठको के विविध आयामन पर खूब विचार भइल बा। कहल गइल बा कि हर आदमी का? मंत्रद्रष्टा रिसियो बिना भावानुभूति के बरनन कइले कवि के पद आ प्रतिष्ठा ना पा सकस ओइसहीं सभे काव्य का आनंद के अधिकारियो ना हो सकस। जेतना काव्य रचे खातिर कवि में कवित्व शक्ति आ प्रतिभा के भइल जरूरी होला ओह से तनिको कम प्रतिभा के जरूरत ओकरा श्रोता भा पाठक खातिर ना होला।

भारतीय आचार्य लोग काव्य के आनंद लेवे वाला मतलब काव्यामृत के सवाद लेवे वाला आधिकारिक श्रोता भा पाठक के काव्यानंद के उपभोक्ता, सहृदय, रसिक, भावुक, विदग्ध आ सचेतस कहके संबोधित कइले बा। एह एक-एक संबोधन के मरम बतवले बा। ऊ लोग इहो कहले बा कि एह संसार रूपी बिखहर गाछ पर दूइए गो मीठ फल लागल बा - एगो काव्यामृत का रस के सवादल आ दोसर सज्जन लोग के सङ्गति कइल -

'संसार विषवृक्षस्य द्वे एव मधुरे फले ।
काव्यामृतरसास्वाद: संगम: सज्जनै: सह।।'

बाकिर एह काव्यामृत का रस के सवाद सभे ना ले सके। ऊ कवनो सहृदये अर्थात् रसिके का बस के बात होला। एह सहृदय के बारे में आपन विचार देत ध्वन्यालोककार कहले बाड़न कि काव्य के अनुशीलन के निरंतर अभ्यास से मन रूपी ऐनक साफ होखे के बाद जे आदमी बरनन कइल विषय में लीन हो जाए के जोग बाड़ें उहे सहृदय हउवें -

'येषां काव्यानुशीलनाभ्यासवशात् विशदीभूते मनोमुकुरे। वर्णनीयतन्मयीभवयोग्यता ते हृदयसंवादभाज: सहृदया।।'

काव्यामृत के सवाद लेवे वाला सहृदये एह रस के रहस्य जानेलें आ एकरा से वंचित रहे वाला एकरा के फालतू मतलब अनुपयोगी मानेलें। एही से साहित्य विद्या के सहृदय आ रसिक के विद्या मानल गइल बा। बल्कि अरसिक के आगे काव्य का पाठ के निषेध कइल गइल बा। संस्कृत के एगो कवि ब्रह्मा जी से प्रार्थना करत कहले बा कि हे चतुरानन, हमरा से भइल गलती के फल चाहे जे दे दिहऽ, हम सब सहजता से सह - झेल लेहब। बाकिर अरसिक के मतलब संवेदनहीन आ हृदयहीन के आगे काव्य-पाठ करेके हमरा भाग्य में कबो मत लिखिहऽ कबो मत लिखिहऽ कबो मत लिखिहऽ।

'इतर-पापफलानि यथेच्छया,
वितर तानि सहे चतुरानन।
अरसिकेषु कवित्व-निवेदनम्
शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख।।'

शास्त्र आ नीति-ग्रंथ के ज्ञान गुरु का उपदेस से सम्भव बा बाकिर काव्य का आनंद के सवादे खातिर काव्य शास्त्र के का गूढ़ ज्ञान के जाने का सङ्गे-सङ्गे श्रोता भा पाठक के संस्कार, संस्कृति, संवेदना, संचेतना, मानवीय सरोकार से सम्पन्न भइल जरूरी होला। तुक्कड़ का तुकबंदी पर ताली पीटल आउर बात ह आ कवनो कविता का तह तक गइल आउर चीज ह। आचार्य दंडी के कहनाम बा कि जेकरा शास्त्र के ज्ञान नइखे मतलब जे काव्य का मरम के बोध करावे वाला ग्रंथन के अनुशीलन के ना करे, ऊ ओकरा गुन - दोस के कइसे समुझी आ बिलग करी? आँख वाला नू रूप-भेद, सुन्दर - कुरूप के फरक समुझ सकेला, जेकरा आँखे ना होई ऊ ई कुल्ह का जानी? एही खातिर त काव्य शास्त्र के रचना भइल।

'गुणदोषानशास्त्रज्ञ: कथं विभजते नर:।
किमन्धस्याधिकारोऽस्ति रूपभेदोपलब्धिषु।।
अत: प्रजानां व्युत्पत्तिमधिसंधाय सूरय:।
वाचां विचित्रमार्गाणां निवबन्धु: क्रियाविधिम्।।'
(दशरूपक)

'विक्रमांक देव चरित' में साफ-साफ कहल बा कि 'कवि त कवि, काव्य के श्रोता भा पाठक के काव्य शास्त्र के ज्ञान होखे के चाहीं। साहित्य विद्या के श्रम से वंचित ब्यक्ति कवि का गुन के गरहन करिये ना सके। कुछ काव्य - मर्मज्ञ के मत बा कि काव्य खाली कवि के सृष्टि ना होके श्रोतो - पाठक के दृष्टि ओकरा सफलता - असफलता में सहायक होला। काहे कि जबले कविता श्रोता भा पाठक के हृदय में उतर के एकाकार ना हो जाए आ आनंद उत्पन ना कर दे तब ले ओकर मोल - महातम ना होखे अउर ऊ बुध जन से आदर ना पा सके। कवि के कुल्ह उतजोग निरर्थक हो जाला। एकरे के राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखलें कि 'जो प्रबंध ना बुध आदरहिं। सो श्रम बृथा बालकवि करहिं।।'

बहुते इसारा - इसारा में काव्य का रसिक भा सहृदय श्रोता आ पाठक के महिमा बतावत संस्कृत साहित्य में कहल गइल कि 'काव्य का रस माधुर्य के केहू रसिक मतलब सहृदय जान सकेलें, ना कि ओकर सर्जक कवि। भवानी का भ्रूविलासन के भवानीभर्ता भवे जान सकेलें, ना कि भवानी के जनक भूधर हिमालय।'

'कविता रस माधुर्यं कविर्वेत्ति न तत्कवि:।
भवानी भ्रुकटीभङ्गं भवो वेत्ति न भूधर:।।'

काव्य का पाठक - श्रोता के विमल प्रतिभाशाली भइल जरूरी होला। खाली बाह बाह करे आ ताबड़तोड़ थपड़ी पीटे वाला जरूरी नइखे कि ऊ काव्य के पूरहर आनंद लेइए लेले होखे। प्लेटो त आउर फरिया के कहले बाड़न कि 'काव्यानंद के अधिकारी उहे हो सकेला जे संस्कृति आ शिक्षा में पारंगत होखे' - (One man pre-eminent in virtue and education.)

'एरिस्टोटल्स थिवरी ऑफ पोयेट्री एंड फाइन आर्ट' में अरस्तू के टीकाकार बूचर महानुभाव के कहनाम बा कि 'जइसे नैतिक दृष्टि से सम्पन्न ब्यक्ति नीति शास्त्र के अधिकारी होला ओइसहीं जे परिष्कृत, रुचि सम्पन्न आ शिक्षित समाज के प्रतिनिधिस्वरूप श्रोता भा पाठक काव्य आ कला के अधिकारी होलन। हर एक सुकुमार कला अइसने श्रोता आ पाठक के राह देखेला।' अइसने अँखिगर आ संवेदना - सरोकार वाला श्रोता - पाठक के भारतीय काव्य शास्त्री सभे रसिक, सहृदय, विदग्ध, सचेतस आदि कहके उनकर गुनगान कइले बा दोसरा ओर साहित्य से हीन के बिना सींघ - पोंछ के के जानवर कहले बा सभे - 'साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन:।'

पच्छिम के बिद्वान गेटे कहले बाड़न कि 'जे ब्यक्ति के कान कविता सुने के उत्सुक नइखे, ऊ बर्बर ह चाहे ऊ केहू होखे।' (He Who has no ear for poetry is a barbarian, be he who may.)

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी कविता के महत्व आ मनुष्यता के जगावे खातिर उपयोगी बतावत लिखले बाड़न कि 'अन्त:प्रकृति में मनुष्यता के समय - समय पर जगावत रहे खातिर कविता मनुष्य जाति का सङ्गे चलत आ रहल बा आ चलत रही। जानवर के एकर जरूरत नइखे।' कहे के अर्थ ई बा कि जब-जब मनुष्य अपना मूल सुभाव से भटकल बा आ भटकी तब-तब कविता ओकरा के मनुष्य होखे के एहसास कराई। मनुष्य के जानवर आ मशीन बने से बचाके मानव जाति के गुन - धर्म के रक्षा करी। मानवीय सभ्यता आ संस्कृति के उत्थान आ पहचान खातिर जइसे कविता हर समय उतजोग में लागल रहल बा आ आगहूँ लागल रही। हम पच्छिमी बिद्वान मेकाले के ओर विचार से सहमत नइखीं जवना में ऊ कहले बाड़न कि 'सभ्यता के जइसे - जइसे बृद्धि बढ़ंती होत जाई ओइसे - ओइसे कविता के ह्रास होत जाई।' (As civilization advances poetry necessarily decline.)

बल्कि काव्य के पढ़निहार, सुननिहार संवेदनशील समझिहार सहृदय अर्थात् रसिक पाठक - श्रोता जब अपना भावयित्री प्रतिभा के बदौलत जब ओह काव्य का एक-एक पक्षन के बारीकी से बरनन करलें तब ओह काव्य के सभका खातिर सहज आ सुलभ त बनइबे करेलन ओकरा सङ्गे-सङ्गे कवियो लोग के कमी के रेघरिया के अपने आप के माँजे खातिर मजबूर करेलन।
सम्प्रति:
डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'
प्रताप भवन, महाराणा प्रताप नगर,
मार्ग सं- 1(सी), भिखनपुरा,
मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिन कोड - 842001

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