आनंदे साहित्य के संजीवनी ह: डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के आलोचना कर्म पर एगो नज़र- विष्णुदेव तिवारी

भोजपुरी आलोचना में, अपना सहृदयता, तटस्थता, विधि-निषेध सम्मत विनयशीलता, वैज्ञानिकता आ सहज सरलता ख़ातिर ख्यात, डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के योगदान महत्वपूर्ण बा। उनकरा आलोचना के आधार कृति बा, कृतिकार के जाति, धर्म, विचारधारा आ परवरिश ना। ऊ जतना सहृदयता से गुलरेज शहजाद के कृति चंपारन सत्याग्रह-गाथा पर 'उहे भूमि बाटे चम्पारन' शीर्षक से बात करेलन ओतने सहृदयता से अरुण त्रिपाठी 'अशेष' रचित 'प्रेमायन' पर 'प्रेमायन: रामकाव्य परंपरा में भोजपुरी के अवदान' शीर्षक से बतियावे लन आ बिना आपन कवनो विचार बोवले, रचयिता लोगन के कृतियन तक पहुँचे के सुंदर राह देखा देलन। रुचिकर आ प्रसंगानुकूल भाषा के प्रयोग से मिश्र जी के आलोचना में शास्त्रीय गरिमा के निर्वाह भइल सुखद लागेला। 'प्रेमायन' के आलोचना के क्रम में ऊ लिखत बाड़े- "कवनो महाकाव्य खातिर ओह में महत् उद्देश्य भइल जरुरी होला। महाकाव्य अपना पूर्वर्ती युग के अध्ययन करेला, वर्तमान के निरखेला आ भविष्य के पूर्वासित करेला, काहे कि ओकरा अपना दा़यित्व के ज्ञान रहेला आ समसामयिक समाज के उन्नति के महान उद्देश्य ओकरा सोझा होला। 'प्रेमायन' का कवि का सोझा प्रेम के पुनर्स्थापना के महान उद्देश्य बाटे।"(कसउटी पर भोजपुरी कविता/पृ.92) 'चंपारन सत्याग्रह-गाथा' के बारे में उनकर कहनाम बा- "कवि ...चम्पारन के माटी के विशेषता, उहाँ के लोग के भोलापन, ओह लोग के त्रासद स्थिति के चित्रण, संक्षेपे में सही, प्रभावशाली ढँग से कइले बाड़न। आज एह प्रबंधात्मक काव्य के परोसे के उद्देश्य चम्पारने के लोग के ना, पूरा भोजपुरी भाषी क्षेत्र के ओकरे भाषा में हक खातिर जागरुक बनावल हो सकत बा। ओकरा बादो अगर विद्वान लोग का एह काव्य के प्रबंध भइला पर प्रश्न बा, त गाथा काव्य त ई बड़लहीं बा।"

द्रष्टव्य बा कि गुलरेज शहजाद के एह प्रबंधात्मक कृति के रचना पाँच सर्ग में भइल बा। डॉ. ब्रजभूषण मिश्र अपना ओर से, कृति के साथ-साथ चलत, एकरा काव्यात्मकता- सर्गबद्धता, विषय-वस्तु, शिल्प-शैली, भावाभिव्यंजना, सोद्देश्यता आदि पर सचेतनता के साथ बात करत, एके एगो सुंदर प्रबंध कहत बाड़े, बाकिर एकरा पर गलथेथ नइखन करत, नूँ बहका के अनकरा आरी-डँड़ारी मँकावते बाड़े। ऊ त बस अतने कहत बाड़े- "काव्य कथा के आनंद लीं सभे।"

आनंदे साहित्य के संजीवनी ह। जवन रचना-आलोचना बेकारे कपार चाटे, तथ्यहीन वक्तव्य छाँटे, ओकरा से त' लोग दूरे रहे के जतन करी?

बाकिर आलोचना के काम हर जगह, हर घरी सहृदयते आ समन्वय कइल ना ह, जवन शास्त्रमत आ लोकमत के प्रतिकूल जात होखे, ओकरा के दृढ़ता आ स्पष्टता के साथ खंडितो कइल ह। आधुनिक भोजपुरी कविता के जवन समझ आ सरोकार बा, ओकरा के भारतीय आ मानवीय सरोकारन के साथ रख के समझे-बूझे ख़ातिर डॉ. मिश्र के आलोचना मौलिक अगहर के भूमिका में लउकत बा। एहिजा मौलिकता के मतलब परंपरा, आधुनिकता आ वैयक्तिकता के साथ कवनो कृति में निहित तथ्य आ सत्य के प्रकाशन से बा, जवन हइए नइखे ओकर अज़ूबा उद्घाटन से ना। एह से इनका निष्कर्षन में कटुता आ अइँठ नइखे। भोजपुरी प्रबंध काव्य में रस-चर्चा के दौरान मिश्र जी कहत बाड़े- "रसन के अनुकूल रीति, वृत्ति, गुण, अलंकार के प्रयोग आ भाषिक दृष्टि के निर्माण में भोजपुरी-प्रबंधकाव्य सफल बाटे।" बाकिर एकरा पहिले ऊ उपलब्ध प्रबंधकाव्यन के सांगोपांग विवेचन करत बता चुकल बाड़े कि- "रस-रसांग के परिपुष्टता के दृष्टि से 'बउधायन', 'नारायण', 'के' अउर 'कालजयी कुँअर सिंह' महाकाव्य श्रेष्ठ बाटे। ओतहीं खण्डकाव्य 'सीता के लाल' वीर, भक्ति आ हास्य रस के अजायब घर बन गइल बाटे।"(कसउटी पर भोजपुरी कविता/पृ. 40)

भोजपुरी के सइ से अधिका दिवंगत साहित्यकारन के जीवन आ कृत्य के प्रगट क के डॉ. मिश्र भोजपुरी साहित्य के प्रति अपना सहज संलग्नता के परिचय दे चुकल बाड़े। डॉ. मिश्र के कुछ महत्वपूर्ण आलोचनात्मक आलेखन के नाँव बा-

1. भोजपुरी काव्य के ठहरत आ बदलत पड़ाव
2. भोजपुरी काव्य के महानायक वीर कुँवर सिंह
3. भोजपुरी नवगीत: एगो लेखा-जोखा
4. सन्तावन के पहिल सितारा: 'वीर सिपाही मंगल पांडेय'
5. नारी मन के व्यथा के कविता
6. पिया के पसेना ई मेहनती महीना बा
(कविवर अनिरुद्ध के काव्य पर आलोचना)
7. बोझा ना कबो हलुकाइल
(डॉ. अशोक द्विवेदी के कवितन पर बात)
8. रसै-रसै बरसे पिरीत
(हरिराम द्विवेदी के गीत-संसार)
9. नया एगो सूरज उगावे के होई
(चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह के ग़ज़लन पर बात)
10. टूअर बन बिलख-बिलख घूमे
(हरीन्द्र हिमकर के काव्य-कृति 'रमबोला' के आलोचना)
11. छिटकल 'सोन किरिनिया'
(नेपाली कवि सुरेन्द्र प्रसाद गिरि के कविता-संग्रह 'सोन किरिनिया' पर एगो ट्रेलर)
आदि।

डॉ. मिश्र के आलोचना सम्बन्धी दू गो किताब बड़ा प्रसिद्ध बाड़ी स-

1. कसउटी पर भोजपुरी कविता (2008)
2. भोजपुरी साहित्य: परंपरा आ परख (2021)

उमेद बा कि मिश्रजी के शोध- 'भोजपुरी प्रबंध काव्य: वस्तु आ शिल्प' लगले प्रकाशित होई।

डॉ. मिश्र के व्यक्ति-जिनिगी आ कृति-जिनगी प लोग शोध कर रहल बा। डॉ. ओम प्रकाश सिंह आ प्रतिमा कुमारी के लिखल किताब 'भोजपुरी के विकास में डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के अवदान' (2020) प्रकाशित हो चुकल बा, जेकर भूमिका डॉ. जयकांत सिंह 'जय' लिखले बाड़े।
सम्प्रति:
विष्णुदेव तिवारी, बक्सर, बिहार

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