मुखिअई लड़ीं



नोकरी सोकरी कइलीं नाहीं
कइलीं ना कमाई, मुखिअई लड़ीं
पिया तबे छूटी जिनिगी के काई, मुखिअई लड़ीं।

नैहर के साया साड़िन से कब तक दिन कटाई जी
कतने फागुन अइहें जइहें गलिया ना चिकनाई जी
पिया भाग रउरो अबकी अजमाईं, मुखिअई लड़ीं।

देवरु मुखिआ के मउगी रोजहीं बदले ओठलाली जी
कई बरीस से रोज मनत बा उनका घरे दीवाली जी
बा मोहाल एने लकठो के मिठाई, मुखिअई लड़ीं।

काठा कठुली बेंचि के राजा माल थोरे गठिया लीं जी
दू -चार चोर लफंगन के रउरा बलमा पोटिया लीं जी
रउरो राखीं अपना बगली में सलाई, मुखिअई लड़ीं।
हरेश्वर राय, सतना, म.प्र.

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