सुखारी चाचा

सुखारी चाचा

कटहर लेखा मुंह काहे लटकल ए सुखारी चाचा।
लागता कि हार तोहरा खटकल ए सुखारी चाचा।।

ताल के टोपरा बेंच बांच के लड़ल ह तूं मुखिअई।
हरलह त पोंछिया तहार सटकल ए सुखारी चाचा।।

भोरहीं भोरहीं तूं अंगरेजी से करत रहल ह कूल्ला।
फुटानी के बरखा त अब चटकल ए सुखारी चाचा।।

बहुत दिनन से डूबि डूबि के पीयत रहल ह पानी।
लगता कि अबकी टेंगर अंटकल ए सुखारी चाचा।।

राजनीति के छोड़ के चस्का जा अब कीनs कटोरा।
साधू चा के पिछवा चल लटकल ए सुखारी चाचा।।
हरेश्वर राय, सतना, म.प्र.

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