डॉ. बलभद्र: साहित्य के प्रवीन अध्येता - विष्णुदेव तिवारी

डॉ. बलभद्र के, अबतक भोजपुरी में लिखल कुछ महत्वपूर्ण आलोचनात्मक आलेखन के संकलन, उनकरा 'भोजपुरी साहित्य: हाल-फिलहाल' नाँव के क़िताब में कइल गइल बा। एह क़िताब के महत्व एकरा में आलोचित कृति आ कृतिकार के, मौलिक नज़र से निरखला-परखला के वज़ह से त बड़ले बा, ई एहू से महत्वपूर्ण बा कि एह में कुछ विधा विशेष के फिलहाल के लेके स्वस्थ, यथार्थपूर्ण आ सारगर्भित बतकही कइल गइल बा। ई एक तरह से आलोचना आ इतिहास के युगलबंदी ह। आज के भोजपुरी साहित्य के प्रवीन अध्येता के रूप में बलभद्र के आपन पहचान बा। एह पुस्तक में आइल उनकर आलेख एकर प्रमाण बाड़े स। उनकर कुछ प्रमुख आलेख बा-
1. भोजपुरी कहानी के फिलहाल
2. कविता के भीतर के बतकही
3. भोजपुरी के महिला कहानीकारन के कहानी
4. मोती बी.ए. के काव्य-दृष्टि
5. किसान कवि बावला
6. पी. चन्द्र विनोद के गीत: तनी गुनगुनात
7. शारदानंद जी के 'बाकिर'
8. 'गाँव के भीतर गाँव' के बारे में
9. बात: लोकराग के लेके
10.'कविता' के गजल अंक
11.भोजपुरी में कथेतर गद्य
2020 में बलभद्र के एगो अउरियो किताब प्रकाश में आइल, जेकर नाँव ह- 'भोजपुरी साहित्य: देश के देस का'। ई किताब हिन्दी में बा। इहो किताब एगो संकलने ह जेमे आइल कुछ प्रमुख आलेखन के नाँव बा-
1. देश के देश की कविता
2. भोजपुरी में विस्थापन के काव्य-प्रसंग
3. भोजपुरी कविता का जनपक्ष
4. विभाजन को खारिज करते 'मुस्लिम लोकगीत'
5. 'बटोहिया' और 'अछूत की शिकायत' के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और सरोकार, आदि।
बलभद्र जवने विषय उठावे ले ओकरा में, अपना ओर से, भरपूर रंग-नूर भरे के कोशिश करेले। कबो ई बहुत सुंदर बन जाला, कबो विवाद के पुरहर गुंजाइश छोड़ जाला। रघुवीर नारायण के 'बटोहिया' आ हीरा डोम के 'अछूत के शिकायत' - दूनों कवितन के साथ-साथ रखत उहनी के विविध पक्षन के उटकेरत ऊ जवन कुछ स्थापना दे रहल बाड़े ऊ विचारपूर्ण होखे के साथ-साथ विचारणीयो बा। 'बटोहिया' के बारे में बलभद्र के कहनाम बा कि-
1. "सबसे पहले तो यह गीत तथाकथित हिन्दुत्ववादियों की 'वन नेशन' थ्योरी को नकार दे रहा है। इस गीत के अनुसार भारत देश के भीतर कई 'देस' हैं। कविता में स्पष्ट रूप से 'भारत के देसवा' कहा गया है, 'भारत मोरे देसवा' नहीं। यहाँ 'देश' और 'देस' के बीच के अंतर को समझ लेना होगा। कविता में आए 'देस' के मतलब को ठीक से नहीं समझा गया है। उसको 'देश' के अर्थ में समझने की भूल हुई है। दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह की प्रसिद्ध पुस्तक 'भोजपुरी के कवि और काव्य' में भी फुटनोट में 'देस' का अर्थ 'देश' बताया गया है।"
आगे बलभद्र बतावत बाड़न कि लोक में 'देस' का अर्थ ऊ जगह, ऊ पूरा परिवेश जहाँ जनम आ परवरिश भइल रहेला, जहाँ के रीति-रिवाज, रोजी-रोजगार, रहे के लूर-ढँग एक नियर होला। भोजपुरी में 'परदेश' माने 'विदेश' ना होला। बात आगे बढ़ावत, उदाहरण देत, समुझावत बलभद्र निष्कर्ष निकालत बाड़न कि- "बटोहिया के अनुसार, भारत कई 'देशों', कई भाषाओं, कई संस्कृतियों, कई धर्मों, कई मान्यताओं का देश है।"
बलभद्र के बातन में कई बात बा। हमनी के उनकरा कहलकी के मुख्य विन्दुअन पर विचार कइल जाउ। उनकर 'देस' के अर्थ के बारे में कहनाम ग़लत नइखे। भोजपुरिए में नाहीं बंगालियों में 'देस' आ 'परदेस' के एगो माने उहो होला, जवन ऊ भोजपुरी में कहत बाड़े। इहाँ तक कि हिन्दियो में कहल जाला 'जैसा देश वैसा वेश' आ ई भोजपुरियो प्रयोग में कम ना आवे- 'जइसन देस ओइसन भेष'। बाकिर, 'देस' त कबीरोदास लिखत बाड़े- 'रहना नहिं देस बिराना है!' एहिजा 'देस के माने निश्चित रूप से ऊ ना ह, जवन विद्यापति के 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' वाला 'देस' में बा। 'देस' के अर्थ प्रयोग सापेक्ष बा, जइसन दोसरो शब्दन के अर्थ होला। रघुवीर नारायण 'देस' शब्द के प्रयोग एकदम ओही अर्थ में कइले बाड़े जवना अर्थ में हिन्दी भा संस्कृत वाला 'देश' के होला जेकर अँग्रेजी अनुवाद कंट्री (country) ना, नेशन (nation) कइल जाला। 'भारत के देसवा' माने 'भारत मोरे देसवा' ना भइल- बलभद्र के ई कहनाम मान लिहल जाउ कि ठीक बा, तबो 'भारत के देसवा' माने 'भारत के भीतर बँटल-बँटाइल, कटल-कटाइल कई देसवा भा जगहवो त ना नूँ भइल, जेमे अलगाववादी गैंग कुलाँच भरेले? 'भारत के देसवा' माने 'भारत देशवा' भइल, जहाँ ऋषि चारू वेद गावत रहले, जहाँ के कन-कन में सीता, राम आ कृष्ण के अमर यश भरल परल बा, जेकर वर्णन, चित्रण भा अध्ययन ओकरा के तूरि के ना कइल जा सके, काहें कि (प्रकाश में रत) भारत के सम्बन्ध (एहिजा) ओकरा अस्तित्व आ अस्मिता से बेसी बा (जेकर एगो अंग बेशक भूगोलो होला), भूगोल से कम।
रघुवीर नारायण के भारत अखंड, अविभाज्य, सार्वभौम एकाई ह, जेकरा के बेर-बेर लूटल गइल, बेर-बेर मुआवे के कोशिश कइल गइल, बाहरे के ना, भीतरो के दुश्मन जेकर खलारा ओदार करे में ना हिचिकले आ ऊ जीअत रहल।... जे आजुओ संविधान प्रदत्त शक्ति लेके, अपना अमर संतानन ख़ातिर असंख्य लक्षित-अलक्षित शत्रुअन से जूझ रहल बा।
भारत के सम्बन्ध खाली भूगोले से नइखे। रघुवीरे नारायण वाला भारत के जइसे विस्तार देत रामधारी सिंह 'दिनकर' अपना कविता 'किसको नमन करूँ?' में, समूच भूमंडल के भारत कह रहल बाड़े-
भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं शील यह भूमंडल भर का है।
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है।
पहिले लोकभाषा में 'श' के जगह पर 'स' आ 'व' के जगहा प 'ब' ही लिखल जात रहे। आजुओ बहुत लोग 'देस' आ 'बनबिलार' ही लिखेला। रघुवीर नारायण के 'देस' माने 'देश' ही भइल, जेकरा के विष्णुपुराण के रचयिता एह तरी व्यक्त करत बाड़े-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र संतति:।।
(द्वितीय अंश/तृतीय अध्याय/प्रथम श्लोक)
सबसे मार्का वाली बात ई बा कि भोजपुरी भाषा के प्रकृति बहुवचन वाली ह। इहाँ एको वचन के संज्ञान में ले आवे ख़ातिर बहु वचन अस प्रयोग में ले आइल जाला। मतलब इहाँ 'देसवा', 'भेसवा', 'खेतवा', 'कलेसवा' आदि 'वा' प्रत्ययांत शब्द हरमेस बहुए वचन ना होला, जइसे- 'खेलत' मो रहनी रामा, बाबा के दुअरवा से आई गइले डोलिया कँहरवा ए राम!' के माने ई ना भइल कि बाबा (पिता) के एक से अधिका दुआर बा, जहाँ एक से अधिका डोली लेके कँहार लोग आ गइल। (ई निरगुन ह आ एकर आध्यात्मिक अर्थ बा। ई सामान्य अर्थ ह।) कबो-कबो त एको वचन के प्रयोग, अर्थ में बहु वचन हो जाला, जइसे, उपरे आइल निरगुन के यदि 'खेलत' मो रहनीं रामा बाबा के दुअरवा से आइ गइले डोलिया कँहार, ए राम!' जइसन लिखल जाउ त' एकर माने ई ना होई कि- डोली लेके एकही कँहार अइले।… त' देसवा माने देश, जे एक वचन ह, कई गो देश ना जे बहु वचन ह।
आ...'तथाकथित हिन्दुत्ववादी' कहला के का मतलब? तथाकथित आलोचक यदि 'बटोहिया' के 'अपर प्रदेस देस सुभग सुघर भेस,मोरे हिन्द जग के निचोड़ रे बटोहिया' आ 'सुंदर सुभूमि भइया भारत के भूमि जेहि, जन 'रघुबीर' सिर नावे रे बटोहिया' पर, कविता के साथ चलत, सोचले-विचरले रहिते त' ई कबो ना कहिते कि 'देस' के भीतर 'देस' होला। देश एके होला, ओकर अभिव्यक्ति अनेक होला आ 'मोरे हिन्द' भा 'मोरे भारत' भा 'भारत मोरे देसवा' अलग-अलग चीज ना होके, एके चीज होला।
'बटोहिया' गीत के कवनो तरी से पढ़ीं, (आजु-काल हिन्दी में कवनो शाही जी के 'खुला पाठ' के धूम मचल बा, से 'खुला पाठ' से पढ़ीं) ई हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति-संस्कार आ मान्यता के अलावे अउरी कवनो धर्म, संस्कृति आ मान्यता के बात नइखे करत। एह में आइल सांस्कृतिक-धार्मिक पुरुष आ प्रतीक कवनो दोसरा धर्म आ संस्कृति के नइखन। जवन हइए नइखे ओकरा रहबार के बात कइल, अनुचित कहाई।
'बटोहिया' समग्रत: सनातन धर्म आ संस्कृति के बात करत बिया, जेमे हर धर्म, हर संस्कृति, हर पवित्र विचार समाहित बा।
2. "भोजपुरी समर्थन के उत्साह में 'बटोहिया' को भोजपुरी का 'वंदे मातरम्' तक कह दिया गया। इस बात पर बस इतना ही कहना है कि 'बटोहिया' अपने आप में एक स्वतंत्र रचना है। किसी उपन्यास या अन्य रचना में प्रसंगवश आया हुआ गीत नहीं।"
बलभद्र इहो कहत बाड़े कि 'वंदे मातरम्!' से तुलना क के 'बटोहिया' के कमतर क दिआइल बा।
'वंदे मातरम्' के कवनो उपन्यास (आनंदमठ/बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय/1882) भा कवनो अन्य रचना में प्रसंगवश अइला से ओकर स्वतंत्र रचना के रूप में आइल 'बटोहिया' से महत्व कम नइखे हो जात। 'श्री मद्भागवत गीतो' त' 'महाभारत' में प्रसंगेवश आइल बा। ए से का कवनो स्वतंत्र धार्मिक ग्रंथ, जइसे शंकराचार्य के 'भज गोविन्दम्' से ओकर महत्व कहाँ कम हो जात बा? तुलना यदि उचित होखे त ओकरा से रचना के महत्व बढ़ेला। 'वंदे मातरम्' (1882) आ 'बटोहिया' (1911) दूनों गीत राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम में लक्ष-लक्ष लोगन के प्रेरणा रहे।
बलभद्र खुदे 'बटोहिया' के कुछ गीतन आ कवितन से तुलना करे के कहत बाड़े। एकर का माने?
रघुवीर नारायण के 'बटोहिया' आ हीरा डोम के 'अछूत की शिकायत' के लेके बलभद्र के कहनाम बा कि दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह के किताब 'भोजपुरी के कवि और काव्य' में नूँ हीरा डोम के नाँवे बा नूँ उनकरा एह कविते के जिकिर बा जबकि रघुवीर नारायण आ उनकरा 'बटोहिया' के मज़ग़र ज़िकिर बा। बलभद्रे के शब्दन में-
"ऐसा क्यों हुआ, इस तथ्य को किस रूप में समझा जाए, यह प्रश्न अवश्य बनता है।"
कवनो प्रश्न नइखे बनत! हँ, आलोचक जे तरी से प्रश्न बनावत बाड़े ओही पर प्रश्न बनत बा कि ऊ एह तरी प्रश्न बनावत काहें बाड़े? द्रष्टव्य बा कि हीरा जी के एह कालजयी कविता के महावीर प्रसाद द्विवेदी अपना पत्रिका 'सरस्वती' (1914) में प्रकाशित कइले रहले। दुर्गाशंकर जी के एह कविता के बारे में जानकारी ना रहे, त' ना प्रकाशित कइले। कवनो अउर बात रहित त' ऊ साफे लिख देले रहिते, जइसे, अपना किताब में एगो कवि खुदाबक्स के बारे में लिखत ऊ कहत बाड़े कि इनकरा कविता में अश्लीलता पराकाष्ठा पर बा, एसे इनकर कविता प्रकाशित करे के लायक नइखे। (भोजपुरी के कवि और काव्य/द्वितीय संस्करण/पृ.188)
आजुओ, हीरा डोम के बारे में, उनकरा एह कविता के अलावे, हमनी के बहुत कुछ नइखीं जानत जा।
कबो-कबो कवनो रचनाकार दोसरा रचनाकार के बहुते नीमन से जानत रहेला, तबो ज़रुरी जगह प ओकर नाँव ना लिख पावेला, संभव बा बिसभोरी से, संभव बा डाहे भा तिरछोलई से, तबो ई कहल कि 'फलाना फलाना के नाँव ना लिखले त प्रश्न त बनते बा कि काहें?' वाज़िब ना होई। नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डॉ तैयब हुसैन 'पीड़ित' जइसन आलोचक लोग अपना आलोचना,इतिहास आदि में, ढेर लोग के नाँव जानिए-बूझ के छोड़ देला, त का हो गइल? उनकर मर्ज़ी। खुद डॉ बलभद्र अपना कई सुंदर आलोचनात्मक आलेखन में कई समकालीन सुंदर रचनाकारन के (जेकरा के निश्चित रूप से ऊ जानत बाड़े) ज़िकिर नइखन करत, त का हो गइल? ओकर चर्चा दोसर लोग करी। बस रचना में दम होखे के चाहीं।
विष्णुदेव तिवारी, बक्सर

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

मुखिया जी: उमेश कुमार राय

मोरी मईया जी

जा ए भकचोन्हर: डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

डॉ रंजन विकास के फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया - विष्णुदेव तिवारी