कक्का



कतना करीं बड़ाई कक्का
रउआ बड़ी महान हईं।

अइसन चाल चलीला जेकर, खोजे ना मिले काट
चानी- सोना से बकसा फाटे, पहिन चलीला टाट
पागल गज के ऊपर बैठल
कक्का रउरा पिलवान हईं।

फूलन में बैठल नाग रवा, आसतीन के सांप रवा
रउवा अपने में आप हईं, आ माहील के बाप रवा
आग लगावेवाली रउरा
माचिस के दोकान हईं।

दउरि दउरि के पीअले बानी, पनिया घाटे- घाट
दुअरे बैठल रावा लगाईं, गजब- गजब के साट
छक्का पर छक्का मारीला
रउरा गुणन के खान हईं।
हरेश्वर राय, सतना, म.प्र.

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

मुखिया जी: उमेश कुमार राय

मोरी मईया जी

जा ए भकचोन्हर: डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

भोजपुरी कहानी का आधुनिक काल (1990 के बाद से शुरु ...): एक अंश की झाँकी - विष्णुदेव तिवारी

डॉ. बलभद्र: साहित्य के प्रवीन अध्येता - विष्णुदेव तिवारी