किसान की जीत: हरेश्वर राय

किसान की जीत: हरेश्वर राय 

एक छोटा सा गाँव था। जमुआँव। उस गाँव में सुदामा नामक एक किसान रहता था। वह मेहनती और ईमानदार था।

सुदामा पढ़ा-लिखा नहीं था। इस बात का उसे बड़ा दुःख रहता था। उसने अपने इकलौते बेटे को खूब पढ़ाया। उसका नाम था निर्मल। निर्मल की पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए सुदामा को दिन-रात एक करना पड़ा। इसके लिए उसे थोड़ी-बहुत अपनी जमीन भी बेचनी पड़ी।

निर्मल एक बहुत अच्छा लड़का था। वह पढ़ने में खूब मन लगाता था। लगन और परिश्रम के बल पर वह हर कक्षा में प्रथम आता था। बी.ए. पास करते ही उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई। पिता-पुत्र दोनों प्रसन्न हो गए। वर्षों की तपस्या जो सफल हुई थी।

निर्मल को अच्छा वेतन मिलता था। वह प्रतिमाह अपने पिताजी को मनीआर्डर द्वारा एक-एक हजार रुपए भेजा करता था।

गाँव का डाकिया मुनेसर बहुत धूर्त था। वह जानता था कि सुदामा लिखा-पढ़ा नहीं है। अतः 'एक हजार रुपये पाया' लिख कर वह सुदामा के अंगूठे का निशान ले लेता था। एक हजार की जगह वह सुदामा को मात्र पाँच सौ रुपये ही दिया करता था। इस तरह एक वर्ष बीत गया।

एक बार निर्मल घर आया। उसे एक माह की छुट्टी मिली थी। बातचीत के क्रम में सुदामा को पता चला कि निर्मल प्रतिमाह उसे एक हजार रुपए भेजता रहा था। सुदामा को यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि डाकिया ने उसके अनपढ़ होने का अच्छा फायदा उठाया था। उसने अपने ठगे जाने की बात किसी को भी नहीं बताई। निर्मल को भी नहीं।

सुदामा ने डाकिया को अच्छा पाठ पढ़ाने का निश्चय किया। उसने निर्मल की सहायता लेकर पढ़ना-लिखना शुरू कर दिया। कठिन परिश्रम और लगन के बल पर सुदामा एक माह में ही बहुत कुछ पढ़ना-लिखना सीख गया। निर्मल के चले जाने के बाद भी सुदामा पढ़ता-लिखता रहा। सुदामा के पढ़ने-लिखने की भनक किसी को नहीं मिल सकी।

निर्मल के चले जाने के एक माह बाद की बात है। डाकिया सुदामा के घर पँहुचा। पहले की तरह ही 'एक हजार रुपये पाया' लिख कर डाकिए ने सुदामा को अंगूठे का निशान लगाने को कहा। चुपचाप सुदामा ने अंगूठे का निशान लगा दिया। डाकिया पाँच सौ रुपये सुदामा की हथेलियों पर रख कर जाने लगा तो सुदामा ने तुरन्त कहा- "बाकी पाँच सौ रुपए कब मिलेंगे डाकिया बाबू?"

डाकिया सकपका गया। "कैसे पांच सौ रुपये?" उसने कहा।

"अरे डाकिया बाबू, अब तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते, मैंने पढ़ना-लिखना सीख लिया है। पाँच सौ रुपये जल्दी ही जेब से निकालो, गत बारह माहों के पाँच-पाँच सौ रुपये भी एक सप्ताह के भीतर ही दे जाना अथवा मैं तुम्हारे खिलाफ मामला दायर करूंगा।"

सुदामा की बात सुनकर डाकिया उसके पैरों पर गिर पड़ा।

डाकिया सुदामा को पूरी रकम लौटाने का वचन देकर विदा हुआ।

(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, फरवरी (द्वीतीय) 97; वर्ष: 11, अंक 15)

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