मम्मी तुम बहुत अच्छी हो: हरेश्वर राय
मम्मी तुम बहुत अच्छी हो: हरेश्वर राय
सुबह का समय था, घर के सामने वाले उद्यान में बने पक्के चबूतरे पर धूप पसरी हुई थी। रंग-बिरंगे फूलों की पंखुड़ियों पर ओस की नन्हीं-नन्हीं बूँदें मोती के दानों की भाँति चमचम चमक रही थीं। चबूतरे पर दरी बिछी हुई थी। दरी पर अंबु और उसकी मम्मी बैठे हुए थे। मम्मी स्वेटर बुनने में व्यस्त थीं और अंबु रंगीन पेंसिल से अपनी मम्मी का चित्र बनाने में मग्न था। बीच-बीच में वह अपनी मम्मी को चित्र दिखा-दिखाकर पूछ लिया करता 'देखो तो मम्मी, चित्र तो अच्छा है न?'
अंबु का उत्साहवर्द्धन करने को मम्मी चित्र देखकर मुस्कुरा देतीं और कह देतीं, 'अरे वाह बेटा, बहुत सुन्दर।'
अंबु पांचवीं कक्षा का छात्र था। प्यार से सभी लोग उसे छोटू के नाम से पुकारते थे। अपनी मम्मी का चित्र बनाते-बनाते छोटू विचारमग्न हो गया, 'मेरी मम्मी कितनी अच्छी हैं। सुबह से शाम तक वह मेरे ही कामों में उलझी रहती हैं। कितना ध्यान रखती हैं मेरा, डांटती तो बिल्कुल ही नहीं, नहलाना-धुलाना, खिलाना-पिलाना, जूते चमकाना, स्कूल जाने के लिए बैग तैयार करना आदि उनका नित्य का कार्य है।'
छोटू सोचता ही चला गया, 'स्कूल से लौटने पर मम्मी मेरे साथ लुकाछिपी खेलती हैं तो मजा आ जाता है। कभी-कभी वह घोड़ा बनकर मुझे अपनी पीठ पर बिठा लेती हैं और पूरे घर की सैर कराती हैं। चल घोड़ा चल कहकर जब मैं उसे बनावटी चाबुक मारता हूँ तो उसकी गति बढ़ जाती है। वह मेरा गृह कार्य करने में भी सहायता करती हैं। वह जो कुछ भी पढ़ाती हैं वह साफ-साफ समझ में आ जाता है। सोते समय उनकी कहानियाँ सुने बगैर आखिर नींद क्यों नहीं आती? क्यों? आखिर क्यों?'
तभी 'छोटू, छोटू' की आवाज सुनकर उसका ध्यान भंग हो गया। पापाजी उसका नाम लेकर बार-बार पुकार रहे थे। छोटू ने मम्मी की ओर देखा, मम्मी ने उसे पापाजी के पास जाने का इशारा किया।
छोटू को अपने पापाजी से बहुत डर लगता था। वह उनके पास जाने से बहुत कतराता था। वे बात-बेबात किसी को भी डाँट दिया करते थे। हँसते-मुस्कुराते तो बहुत ही कम थे।
कार्यालय जाने से पहले और कार्यालय से लौटने के बाद कलम-कागज लेकर कहानियाँ ही कहानियाँ लिखने में व्यस्त रहा करते थे। छोटू को वे हमेशा ही कुछ न कुछ हिदायतें देते रहते थे। छोटू और उसकी मम्मी के खेल के दौरान थोड़ा-सा भी शोर-गुल हो जाने पर वे दोनों की ही डाँट पिला दिया करते थे।
'छोटू, सुनो तो बेटा,' पापाजी ने पुनः एक बार ऊँची आवाज दी। वह दौड़कर उनके कमरे में जा पहुँचा। पापाजी अपनी टाई बांध रहे थे। टेबल पर सौ रुपए का एक नोट पड़ा हुआ था।
'बेटा छोटू, आज मुझे जल्दी कार्यालय पहुँचना है। इसलिए मैं तुम्हारा मासिक शुल्क जमा करने के लिए तुम्हारे विद्यालय तक नहीं जा सकता। तुम स्वयं ही अपना शुल्क जमा कर देना और रसीद लाकर मुझे दे देना और हाँ, रुपए सावधानी के साथ ले जाना।' एक सौ रुपए का नोट छोटू को देते हुए पापाजी ने कहा।
ठीक समय पर छोटू विद्यालय के लिए रवाना हो गया। सौ रुपए का नोट उसने कमीज की ऊपर वाली जेब में सावधानी से रख लिया। विद्यालय के रास्ते में एक गंदा नाला पड़ता था जिसमें शहर का गंदा पानी तेज रफ्तार से बहता था। नाले पर एक छोटी सी पुलिया, पुलिया के दोनों तरफ रेलिंग भी बने थे।
पुलिया के पास पहुँचकर पुलिया के सहारे थोड़ी देर के लिए नाले में झाँक लेना छोटू की रोज की आदत थी। आज भी वह अपनी आदत से बाज नहीं आया। ज्यों ही उसने पुलिया की रेलिंग का सहारा लेकर नीचे की ओर झाँका कि कमीज की ऊपरी जेब से निकलकर सौ का नोट हवा में तैरने लगा। देखते ही देखते गोल-गोल चक्कर काटता हुआ वह नोट नाले की तेज धार में समा गया।
नोट के लापता होते ही छोटू के हाथ-पाँव फूलने लगे और उसकी आँखें बंद हो गईं। आँखें बंद होते ही छोटू की कल्पना में उसके पापाजी की क्रोधित तस्वीर उभरने लगी।
छोटू के मन में हलचल सी मच गई। वह अपने बचाव का उपाय सोचने लगा, 'ओह यार छोटू, तुम भी कमाल करते हो, घर में कोई झूठ बोल दो, कोई अच्छा सा बहाना बना दो। कह देना कि रास्ते में एक बड़े लड़के ने छीन लिया।'
तभी छोटू को अपनी प्यारी मम्मी का चेहरा याद आया। डूबते को तिनके का सहारा मिला। निराशा के गहरे अंधकार में आशा की किरण दिखाई पड़ी। विद्यालय जाने के बजाय छोटू घर की तरफ लौट पड़ा।
घर पहुँचते-पहुँचते छोटू काफी थक गया था और उस पर उदासी छाई थी। उसे देखते ही मम्मी परेशान हो गईं, प्रश्नों की झड़ी-सी लगा दी ' क्यों बेटा छोटू, वापस क्यों लौट आए? क्या बात है? विद्यालय बंद है क्या?'
अपनी पीठ से किताबों वाला बैग उतारकर छोटू ने टेबल पर रखा और वह अपनी मम्मी से झूठ नहीं बोल सका। उसने अपने साथ घटी घटना का पूरा विवरण ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया।
'कोई बात नहीं बेटा, इसमें उदास होने की क्या बात है? जान-बूझकर तो तूने पैसा फेंका नहीं। थोड़ी लापरवाही हुई है तुमसे आइंदा मत करना' छोटू को समझाते हुए उसकी मम्मी ने कहा।
'परंतु पापाजी तो यह सब समझेंगे नहीं मम्मी। वे मुझसे रसीद मांगेंगे तो मैं भला उनसे क्या कहूंगा? मुझे तो बहुत डर लग रहा है।' छोटू ने अपनी व्यथा बताई।
'अच्छा तो यह बात है, चलो मैं इस समस्या का समाधान भी कर देती हूँ,' मम्मी ने कहा।
'वह कैसे मम्मी?' छोटू ने उत्सुकता से पूछा।
'देखो मेरे पास बैग में पैसे पड़े हैं। विद्यालय पहुँचकर उन्हीं पैसों से मैं तुम्हारा शुल्क जमा करा दूंगी। रसीद तुम्हारे पास रहेगी। शाम को वापस घर लौटकर रसीद पापाजी को सौंप देना, बस।' छोटू की उत्सुकता शांत करते हुए मम्मी ने कहा।
छोटू की जान में जान आई। निर्भय होकर वह अपनी मम्मी के साथ विद्यालय चल पड़ा। रास्ते में उसने अपनी मम्मी को वह नाला दिखाया जिसके पेट में उसका पैसा समा गया था। वैसे छोटू की मम्मी रास्ते भर उससे इधर-उधर की बातें करती रहीं ताकि छोटू इस घटना को भूल जाए। विद्यालय आ गया। शुल्क जमा कराकर मम्मी ने रसीद छोटू को सौंप दी। छोटू रसीद लेकर अपने वर्ग कक्ष की ओर चल पड़ा और उसकी मम्मी वापस घर।
छुट्टी के बाद छोटू घर की ओर चलता रास्ते भर अपनी मम्मी के बारे में सोचता रहा। घर पहुँचते ही पापाजी ने उससे रसीद की मांग की। छोटू ने अपनी जेब से रसीद निकाली और पापाजी को सौंप दी।
रात में खाने-पीने के बाद छोटू रोज की तरह अपनी मम्मी के साथ बिस्तर पर लेट गया। उसकी मम्मी उसे कहानियाँ सुनाने लगीं।
कहानी सुनते-सुनते छोटू को जब नींद आने लगी तो छोटू ने अपनी मम्मी के मुँह पर अपनी नन्हीं-सी हथेली रखकर चुप रहने का संकेत किया। मम्मी के चुप हो जाने पर फुसफुसाते हुए उसने कहा, 'मम्मी तुम बहुत अच्छी हो, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि विद्यालय जाते-आते समय अब मैं नाले में कभी नहीं झाँकूंगा।'
छोटू की बात सुनकर मम्मी ने उसे अपने से चिपका लिया।
(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, फ़रवरी (प्रथम) 99; वर्ष:13, अंक 14