कुकुरदई मंदिर: हरेश्वर राय
कुकुरदई मंदिर: हरेश्वर राय
छत्तीसगढ़ के गाँवों में रहने वाले लोगों की यह आम धारणा है कि बहुत पहले छत्तीसगढ़ में छः माह के दिन और इतने ही समय की रातें हुआ करती थीं। उसी समय की बात है। एक गाँव में रामनाथ साहू नाम का एक साहूकार रहता था। वह चावल का व्यापार कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था।
एक समय की बात है। वर्षाभाव के कारण छत्तीसगढ़ में भयंकर अकाल पड़ गया। धान की फसल पूरी तरह चौपट हो गई। रामनाथ का व्यापार पूर्णतः ठप्प हो गया। उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। वह दाने-दाने के लिए मोहताज हो गया। उसका परिवार भूखे मरने लगा। अतः वह पड़ोसी गाँव के एक मालगुजार के पास कर्ज मांगने के लिए गया।
वह मालगुजार बहुत ही कृपण एवं निर्दयी था। काफी अनुनय-विनय करने पर भी वह रामनाथ को कर्ज देने के लिए तैयार नहीं हुआ। कर्ज प्राप्त करने के लिए अंततः रामनाथ को उस मालगुजार के पास अपने कुत्ते टीपू को गिरवी रखना पड़ा। तय यह हुआ कि कर्ज वापसी के समय रामनाथ टीपू को वापस ले जाएगा।
टीपू एक ऊँचे कद वाला कुत्ता था। वह बहुत तेज, चालाक एवं वफादार भी था। पूरी रात वह मुस्तैदी के साथ मालगुजार की हवेली की सुरक्षा किया करता था। एक रात उस मालगुजार की हवेली में भयंकर चोरी हो गई। चोर हजारों रुपये के आभूषणों एवं सिक्कों की गठरी उड़ा ले गए। टीपू ने जब उन चोरों का पीछा किया तो वे हड़बड़ी में गठरी को गाँव के बाहर वाले तालाब में फेंककर भाग गए। टीपू ने यह सब देख लिया।
चोरी की घटना की सूचना पाकर अगली सुबह उस मालगुजार के दरवाजे पर ग्रामीणों की भारी भीड़ इकट्ठी हो गई। तब वह मालगुजार छाती पीट-पीटकर चिल्ला रहा था- "हाय, मैं तो लुट गया रे। मैं तो कंगाल हो गया रे।"
इसी बीच टीपू दौड़ता हुआ आया और मालगुजार की धोती पकड़कर खींचनी शुरू कर दी। अतः मालगुजार एवं उपस्थित ग्रामीण टीपू के पीछे-पीछे चल पड़े। तालाब के पास पहुँचकर टीपू ने तालाब में छलांग लगा दी। उसके द्वारा बार-बार ऐसा करने पर कुछ ग्रामीण तालाब में उतर पड़े। पानी ज्यादा नहीं था। अतः थोड़ी ही देर में एक ग्रामीण को एक छोटी सी गठरी हाथ लगी। यह उसी मालगुजार की सिक्कों एवं आभूषणों वाली गठरी थी।
टीपू की सूझ-बूझ के कारण मालगुजार कंगाल होने से बच गया। खुश होकर उसने रामनाथ के नाम एक चिट्ठी लिखी जिसमें उसने पूरी घटना का वर्णन किया। तत्पश्चात् वह चिट्ठी उसने टीपू के गले में बांध दी तथा उसे रामनाथ के पास जाने के लिए छोड़ दिया।
टीपू अत्यंत प्रसन्न था। बहुत दिनों के बाद उसे अपने मालिक का स्नेह मिलने वाला था। अतः वह भागते हुए रामनाथ के पास पहुँचा। उसे देखकर रामनाथ ने सोचा कि टीपू मालगुजार के यहाँ से भाग आया है। इसके कारण उसकी प्रतिष्ठा को काफी ठेस पहुंचेगी। अतः गुस्से में अंधा होकर उसने टीपू के सिर पर डंडे से जोरदार वार कर दिया। बेचारा निर्दोष टीपू यह वार सहन नहीं कर सका और तत्काल उसकी मृत्यु हो गई।
इस घटना के तुरन्त बाद रामनाथ की नजर टीपू के गले में बंधी हुई चिट्ठी पर पड़ी। उसने चिट्ठी पढ़ी तो उसे अपनी भारी भूल का अहसास हुआ। चिट्ठी के अंत में लिखा हुआ था- "प्रिय रामनाथ, तुम्हारे प्यारे टीपू ने मुझे कंगाल बनने से बचा लिया है। मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। अतः मैं तुम्हें कर्ज मुक्त करता हूँ और तुम्हारा टीपू तुम्हें वापस कर रहा हूँ।"
चिट्ठी पढ़कर रामनाथ अत्यंत दुःखी हो गया। वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा। बाद में उसने अपने प्रिय कुत्ते की याद में एक भव्य एवं विशाल मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर कुकुरदई मंदिर अर्थात कुत्तादेव मंदिर के नाम से लोकप्रिय हुआ। तभी से प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया के दिन इस मंदिर के पास भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ नवम्बर अंक, 1999)