चुटकी भर नमक: हरेश्वर राय

चुटकी भर नमक: हरेश्वर राय

एक गाँव में बैजनाथ नाम का एक किसान रहता था। अपनी खेती-बाड़ी के काम में उसका मन जरा भी नहीं लगता था। पूजा-पाठ करने व गप्पें लड़ने में ही वह अपना अधिकांश वक्त गुजार देता था। उसकी पत्नी उसके इस व्यवहार से अत्यन्त ही चिंतित रहा करती थी।

खेती-बाड़ी का काम-काज देखने के लिए किसान ने एक नौकर रख लिया था। उसका नाम था हरिया। वह बहुत ही ईमानदार परिश्रमी व भोला-भाला था। अपने मालिक के प्रति वह बहुत ही वफादार भी था।

एक दिन की बात है। हरिया के घर में नमक कम पड़ गया। मालिक का घर उसके घर से ज्यादा दूर नहीं था। इसलिए वह थोड़ा-सा नमक मांगने को वहीं जा पंहुँचा। उस समय मालिक आंगन के बरामदे में बैठकर भोजन कर रहे थे। भोजन करते समय बीच-बीच में नाक भौं सिकोड़ते जा रहे थे और पत्नी को बुरा भला कह रहे थे। उधर मालकिन भी बहुत नाराज लग रही थीं।

तनाव का माहौल देखकर हरिया ने बिना नमक लिए ही लौट जाना उचित समझा। इसी बीच मालिक की नजर उस पर पड़ गई। 'आ रे हरिया, आ बैठ, बैठ'। उसे देखते ही मालिक ने आवाज लगाई और उसे दरवाजे की चौखट पर बैठने का इशारा किया।

हरिया के बैठते ही मालिक शुरू हो गए- 'हरिया, अब तो मेरा जीना हराम हो गया है रे।

अब देखो न, मैं एक माह से प्रतिदिन तुम्हारी मालकिन को चेतावनी देता चला आ रहा हूँ कि आटे में नमक डालकर रोटियाँ मत बनाया करो। परन्तु सुनती ही नहीं। अब तो इन रोटियों को देख कर ही भूख मर जाती है।'

इतना सुनते ही मालकिन आग-बबूला हो गईं। कमरे से बाहर निकलते ही बोली 'सुनो जी, मेरे ऊपर बिना बात दोष लगाना आपको शोभा नहीं देता। मैं क्या मूर्ख या पागल हूँ जो रोज-रोज आटे में नमक डालकर रोटियाँ पकाऊंगी? पता नहीं आपके मुँह के स्वाद को क्या हो गया है? मुझे तो ये रोटियाँ नमकीन नहीं लगतीं।'

इतना कह कर मालकिन मालिक की थाली में से एक रोटी उठाकर हरिया के पास आईं और उसे देते हुए बोलीं 'लो तुम भी यह रोटी खाकर बताओ कि क्या इसमें नमक मिला है?'

हरिया रोटी हाथ में लिए चखने लगा तो उसे वह एकदम फीकी लगी। अब मालकिन के बार-बार पूछने पर भी हरिया कुछ नहीं बोल पा रहा था। वह रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराने लगा। वह भला मालिक-मालकिन के झगड़े में कैसे बोल सकता था?

हरिया को चुप देखकर मालकिन फिर बिफरी 'जो आदमी दिन भर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा उसे भला खाना स्वादिष्ट लगेगा? जो श्रम नहीं करेगा उसे भला भूख लगेगी? भूख लगने पर रूखा-सूखा भोजन भी स्वादिष्ट लगता है। अरे, बगैर परिश्रम किए किसी को......!'

मालकिन मालिक के झगड़े के कारण हरिया को देर हो रही थी। उसे काम पर भी जाना था। अतः बीच-बचाव करते हुए उसने बड़े ही भोलेपन से कहा- 'मालिक, रोटियों के नमकीन होने का रहस्य मेरी समझ में आ गया है। इस मामले में मालकिन का कोई दोष नहीं। दोष तो मेरा ही है।'

'यह कैसे हरिया?' मालिक ने टोका।

'दरअसल आपके खेतों में काम करते समय मेरा शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है। पसीने की बूँदें टपक-टपक कर आपके खेतों में गिरती रहती हैं। पसीना नमकीन तो होता ही है। इसलिए खेतों की मिट्टी भी नमकीन हो गई है। नमकीन मिट्टी में तो नमकीन अनाज ही पैदा होगा न। नमकीन अनाज से बना भोजन स्वादिष्ट तो नहीं ही लगेगा।' हरिया ने आगे कहा।

हरिया की बात सुनकर मालिक-मालकिन जोर-जोर से हँसने लगे। फिर मालकिन से चुटकी भर नमक लेकर हरिया वापस घर लौट गया। 
(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, दिसंबर (द्वीतीय) 97; वर्ष: 12, अंक 11)

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