सूबेदार रामसिंह: हरेश्वर राय
सूबेदार रामसिंह: हरेश्वर राय
शशांक एक सैनिक स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था। हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी वह विद्यालय के वार्षिक समारोह के अवसर पर एक अच्छी कहानी प्रस्तुत करना चाहता था। अतः स्कूल की छुट्टी होने के बाद प्रतिदिन वह अपने छात्रावास के ग्रंथालय में पहुँच जाता था।
वहाँ वह नई-पुरानी पत्रिकाओं को ध्यान से उलटता-पलटता रहता, ताकि कोई अच्छी सी कहानी उसके हाथ लग जाए।
कई दिनों के प्रयास के बाद आखिर वह अपने अभियान में सफल हो ही गया।
शशांक को एक ऐसी कहानी मिल गई जो उसके परिवार के एक सदस्य से संबंधित थी। यह कहानी पाकर वह इतना खुश था मानो उसे कोई खजाना ही मिल गया हो। उसने कहानी को अच्छी तरह याद कर लिया।
समारोह के दिन शशांक कहानी सुनाने के लिए मंच पर आया। उसने कहा- 'प्रिय श्रोताओं, जो कहानी में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ वह एक फौजी के जीवन से संबंधित है। कहानी का शीर्षक है 'सूबेदार रामसिंह'।
शशांक ने आगे कहा-'बात इसी शताब्दी के सातवें दशक की है। तब भारत-पाक सीमा पर तनाव का माहौल कायम था। सीमा सुरक्षा बल के सूबेदार रामसिंह अपने साथियों के साथ सीमा की सुरक्षा में ड्यूटी पर तैनात थे।'
'सीमा पर नागर नाम की एक नदी बहती थी। उसकी धारा अत्यन्त तेज थी। नदी के पार खुले मैदान में मछुआरों का एक छोटा सा गाँव था चमनपुर।
गोलाबारी की आवाजें इस गाँव के निवासियों के लिए कोई नई बात नहीं थीं।'
'एक दिन की बात है। सुबह का समय था। दोनों देशों के सैनिकों के बीच होने वाली गोलाबारी की गति अचानक अत्यंत तेज हो गई। धांय-धांय, धड़ाम-धड़ाम की आवाज से पूरा वातावरण गूँज उठा।
चारों तरफ बारूद की गंध फैल गई। चमनपुर पर तो मानो आफत ही आ गई। तोप के कई राक्षसी गोले चमनपुर के आस-पास आकर गिरे।
गाँव में अफरा-तफरी मच गई। गाँव के सभी निवासी गाँव छोड़कर भाग चले।'
'दोपहर होते-होते गोलाबारी की गति कम हो गई। सूबेदार रामसिंह और उनके साथी बालू से भरी बोरियों से बनी दीवार के पीछे मोर्चा संभाले हुए थे।
वे अभी भी पूरी तरह सतर्क थे। गोलियाँ चलाने के लिए दीवार में बनी छेद से आँखे सटाकर सूबेदार रामसिंह ने चमनपुर पर एक नजर डाली।
पूरा गाँव वीरान नजर आ रहा था। इसी बीच उनकी नजर एक तीन-चार वर्ष के बालक पर जा पड़ी। लड़खड़ाते कदमों से वह नदी की तरफ बढ़ता चला आ रहा था। शायद गाँव में मची अफरा-तफरी के कारण वह अपने माता-पिता से बिछड़ गया था।
यह देखकर रामसिंह के मस्तिष्क में ऐसा विचार कौंधा कि यदि बच्चे को बचाया नहीं गया तो वह काल के गाल में समा जाएगा। या तो कोई सनसनाती हुई गोली उसका काम तमाम कर देगी या फिर नदी की तेज धारा उसे निगल जाएगी।'
'ऐसा विचार आते ही रामसिंह के रोंगटे खड़े हो गए। अविलम्ब ही उसने उस अबोध बालक को बचाने का संकल्प किया।
उसने दीवार में एक छेद बनाई और निकल पड़ा एक खतरनाक अभियान पर। कोहनी और घुटनों के बल रेंगते हुए सूबेदार बच्चे की तरफ बढ़ने लगा। दुश्मन सैनिकों की तोपे एवं रायफलें आग उगलने लगीं। उधर रामसिंह जल्दी से जल्दी बच्चे तक पहुँच जाना चाहता था। तैरकर उसने नदी पार की तथा बच्चे तक पहुँच गया।'
रामसिंह को अपनी तरफ आता देख वह बच्चा डर गया और इधर-उधर भागने लगा। बहुत मुश्किल से रामसिंह उसे पकड़ पाने में सफल हुआ।
बच्चे को पीठ पर बांधकर वह दीवार के पास आया। उसने बच्चे को दीवार में बनी छेद के द्वारा इस पार किया। तत्पश्चात् वह स्वयं भी दीवार पार करने लगा।
इसी बीच एक सनसनाती हुई गोली उसकी बाँह में आ लगी। वह घायल हो गया। इसके बावजूद उसे इस बात की खुशी थी कि उसने एक अबोध बालक को असमय मरने से बचा लिया था।'
'सूबेदार रामसिंह के सैनिक मित्रों ने उन्हें तुरन्त अस्पताल पहुँचाया, जहाँ वे जल्दी ही स्वस्थ हो गए। सरकार ने उनकी इस वीरता के लिए सर्वोच्च सैनिक सम्मान प्रदान किया।'
कहानी समाप्त करते-करते शशांक की आँखें भर आईं। उसने जोड़ा 'श्रोताओं, सूबेदार रामसिंहजी मेरे दादाजी हैं। वे अभी जीवित हैं तथा मुझे बहुत प्यार करते हैं। मुझे अपने दादाजी पर गर्व है।'
(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, नवम्बर (प्रथम) 98; वर्ष:13, अंक 8)