कर्म का फल: हरेश्वर राय
कर्म का फल: हरेश्वर राय
प्रजापति दक्ष ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनकी कन्याओं में से एक का नाम था सती। सती महान शिव भक्त थीं। उनका विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह के बाद एक दिन प्रजापति दक्ष नैमिषारण्य नामक तीर्थस्थल पर पहुँचे। शिवजी सहित अनेक देव, मुनि एवं ऋषि वहाँ उपस्थित थे। दक्ष को देखकर सभी ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। परन्तु भगवान शंकर ने ऐसा नहीं किया। दक्ष को उनका यह व्यवहार अपमानजनक लगा। वे अत्यंत कुपित हो गए। मन ही मन उन्होंने भगवान शंकर से बदला लेने का निर्णय लिया।
इस घटना के कुछ दिनों के बाद दक्ष ने कनखल नामक स्थान पर एक यज्ञ का आयोजन किया। शिव को अपमानित करने का उन्हें अच्छा मौका मिल गया। अतः उन्होंने इस अवसर पर भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। सभी आमंत्रित देव, मुनि एवं ऋषि यज्ञ के आयोजन स्थल पर पहुँचे। शिव को अनुपस्थित पाकर महर्षि दधीचि ने इसका कारण जानना चाहा। उत्तर में दक्ष ने भगवान शंकर के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने शिव को यज्ञ-भाग के लिए अयोग्य बताया। महर्षि दधीचि क्षुब्ध हो गए। नाराज होकर वे अपने आश्रम लौट गए। इसके बाद यज्ञ प्रारंभ हो गया।
एक दिन की बात है, महादेवी सती गंधमादन नामक पर्वत पर भ्रमण कर रही थीं। इसी समय उन्हें अपने पिता के महान यज्ञ के आयोजन का समाचार प्राप्त हुआ। तुरंत वे भगवान शंकर के पास पहुँची और बोलीं- "भगवन्, मेरे पिताजी के यज्ञ में आपको अवश्य जाना चाहिए। मैं जानती हूँ कि आपको आमंत्रित नहीं किया गया है, फिर भी आप तो यज्ञों के देवाधिदेव हैं। अतः आपका वहां जाना तो अत्यंत ही आवश्यक है।"
महादेवी को समझाते हुए भगवान शंकर ने कहा- "महादेवी, आपके पिताजी ने जिन लोगों को पूज्य माना, उन्हें बुलाया है। हम शायद उनके अनुसार इस यज्ञ में भाग लेने के योग्य नहीं हैं। अतः वहां जाना कतई उचित नहीं होगा। जिस स्थान पर मान एवं सम्मान मिलने की आशा न हो, वहाँ जाना अत्यंत ही कष्टप्रद होता है।"
"स्वामी, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। इसके बावजूद मैं अपने पिताजी के यहाँ जाने की अनुमति चाहती हूं। आशा है आप मेरा निवेदन स्वीकार करेंगे। वहाँ जाकर मैं सिर्फ इतना देखना चाहती हूँ कि मेरे पिताश्री प्रजापति दक्ष आपके प्रति किस प्रकार का भाव रखते हैं।" हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक सती ने शंकर से निवेदन किया।
भगवान शंकर ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। तत्पश्चात् वे अपने पिताजी की यज्ञभूमि में आ पहुँची। वहाँ उपस्थित सभी श्रेष्ठजनों को उन्होंने आदर एवं विनय सहित प्रणाम किया। थोड़ी देर बाद सती ने शंकरजी को नहीं बुलाए जाने का कारण जानना चाहा। इस पर प्रजापति दक्ष भड़क उठे। नाराज होकर उन्होंने कहा- "सती, तुम्हारा पति अमंगल एवं अशुभ है। वह यज्ञ में भाग लेने के योग्य तो है ही नहीं। हमने तो तुम्हें भी यहाँ नहीं बुलाया था। तुम यहाँ क्यों आई हो?"
अपने पिता का ऐसा अपमानजनक उत्तर उनके लिए असहनीय था। क्षुब्ध होकर वे यज्ञ की धधकती अग्नि में कूद गईं और जलकर भस्म हो गईं। यह देखकर सभी लोग स्तब्ध रह गए। सती के आत्मबलिदान की कहानी को नारद जी ने भगवान शिव को जाकर सुनाया। शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। तक्षण ही उन्होंने महाबली वीरभद्र को दक्ष का यज्ञ भंग कर उनका वध करने का आदेश दे डाला।
सती के बलिदान से दक्ष अत्यंत चिंतित हो गए। भगवान रुद्र के क्रोध का डर उनमें समा गया। परेशान होकर वे भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे तथा बोले, "महाराज, मैं आपकी शरण में आया हूँ। मुझे बचा लीजिए। भगवान रुद्र के क्रोध से मेरी रक्षा कीजिए।"
दक्ष को गिड़गिड़ाते देखकर भगवान विष्णु ने उनसे कहा- "प्रजापति दक्ष, मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हारा आचरण धर्म के विरुद्ध है। तुमने पूज्य का तिरस्कार किया है। अतः तुम्हें तो अपने कर्मों का फल चखना ही पड़ेगा।"
इसी बीच अपनी सेना के साथ वीरभद्र वहाँ जा पहुँचा। वहाँ उपस्थित देवताओं ने शिव की सेना का सामना करने की कोशिश की परन्तु टिक न सके। भागते हुए वे गुरु बृहस्पति के पास पहुँचे और बोले- "आदरणीय गुरुदेव, हम संकट में हैं। हमारी विजय का कोई तरीका सुझाएँ।"
गुरु बृहस्पति ने साफ-साफ कह दिया- "काम करने वाले के कर्म का फल प्रधान होता है। प्रजापति दक्ष के कर्म का फल ही ऐसा है कि आपकी विजय संभव नहीं है।"
इस समय तक शिव सेना ने भीषण प्रहार प्रारंभ कर दिया था। देवताओं के पैर उखड़ गए। वे भाग चले। वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष का सिर काटकर अग्नि में डाल दिया।
अपने पुत्र दक्ष की मौत के कारण ब्रह्माजी अत्यंत दुखी हो गए। वे भगवान शंकर के पास पहुँचे और दक्ष की ओर से क्षमायाचना की। शंकरजी ने ब्रह्माजी को समझाते हुए कहा- "ब्रह्माजी, दक्ष अपने कर्मों से मौत को प्राप्त हुए हैं। दूसरों को क्लेश पहुँचाने वाले कर्म करने से ऐसा ही फल प्राप्त होता है।"
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ फ़रवरी अंक, 2001)