मीठू की आजादी: हरेश्वर राय
मीठू की आजादी: हरेश्वर राय
बात बहुत पुरानी है। एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। उनके पास मीठू नाम का एक तोता था। वही उनकी रोजी-रोटी कमाने का एकमात्र साधन था।
मीठू को पिंजरे में लेकर पंडित जी प्रतिदिन शहर चले जाते थे। वहाँ सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे अपना आसन डाल दिया करते थे।
पंडित जी भविष्य वक्ता थे। मीठू की सहायता से वे इच्छुक लोगों के भविष्य के बारे में बतलाया करते थे। मीठू के पिंजरे के सामने पड़े लिफाफों में लोगों का भविष्य बंद रहता था।
पंडित जी का इशारा होते ही मीठू उन लिफाफों में से एक लिफाफा अपनी चोंच में उठा लेता था। पंडित जी उस लिफाफे में पड़े कागज के टुकड़े को निकालकर खास अंदाज में पढ़ दिया करते थे। सामने बैठे व्यक्ति अपना भविष्य जान लेने के बाद पंडित जी को दक्षिणा दिया करते। पैसे देने वाले लोगों की मूर्खता और अंधविश्वास पर मीठू को बहुत दया आती थी।
वर्षों से लिफाफे निकालते-निकालते मीठू उब गया था। वह कैद से मुक्त होना चाहता था। उसे अपनी मुक्ति का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। पंडित जी भी बहुत सजग रहते थे। वे पिंजरे का दरवाजा हमेशा अच्छी तरह बंद रखते थे।
एक दिन की बात है शहर जाने के पहले पंडित जी तालाब में स्नान करने गये। मीठू के पिंजरे को भी उन्होंने अपने साथ ले लिया। पिंजरे सहित मीठू को स्नान कराने के बाद पंडित जी ने पिंजरे को तालाब के किनारे रख दिया। इसके बाद वे तालाब में डुबकी लगाने लगे। भूलवश पिंजरे का दरवाजा खुला ही रह गया था। मीठू ने भी इतने अच्छे मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। वह पिंजरे से बाहर निकला और खुले आकाश में उड़ चला।
उड़ते-उड़ते मीठू बहुत दूर निकल गया। शाम हो गई। पश्चिम दिशा में अब सूरज डूबने ही वाला था। दिनभर की उड़ान से मीठू थककर चूर हो गया था। एक घना पेड़ दिखाई पड़ते ही मीठू उस पर जा बैठा। इतनी थकान के बाद भी मीठू बहुत खुश था। वर्षों बाद उसे आजादी जो मिली थी।
सूरज के डूबते ही बहुत सारे तोते उसी पेड़ कर आकर बैठ गये। मीठू की खुशी का ठिकाना न रहा। थोड़ी ही देर में वह उनसे काफी घुल-मिल गया। रात में उसे बहुत अच्छी नींद आई।
सुबह हुई सभी तोते मीठे फलों की तलाश में निकलने के लिए तैयार हो गए। मीठू अभी भी सो रहा था। तोतों के प्रमुख ने उसे जगाकर मीठे फलों की तलाश में चलने के लिए कहा- मीठू भूखा तो था ही। वह सहर्ष तैयार हो गया।
उड़ान भरने के पहले मीठू ने तोतों के नेता से पूछा- "हम लोग मीठे फलों की तलाश में कहाँ जाएंगे?"
"बगीचों में" तोतों के प्रमुख ने जवाब दिया। "क्या उन बगीचों में आदमी भी रहा करते हैं?" मीठू ने पुनः पूछा। "हाँ, हाँ, रहा करते हैं।" तोता प्रमुख ने जवाब दिया। तो, आप लोग जाएँ। मुझे नहीं चाहिये मीठे-मीठे फल। मीठू ने कहा।
तोता प्रमुख ने उसे समझाते हुए कहा "भाई! यहाँ तो मनुष्यों के बगीचों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। उन बगीचों के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं कुछ खाने के लिए उपलब्ध नहीं है। यहाँ तो तुम भूख से तड़प-तड़प कर मर जाओगे।"
"पिंजरे में कैद रहने की संभावना की अपेक्षा भूख से तड़प-तड़प कर मर जाना ज्यादा अच्छा है।" इतना कहने के बाद मीठू पुनः उड़ चला। वह प्रकृति माँ की गोद में स्वतंत्र विचरना चाहता था, जहाँ न तो परतन्त्रता हो और न ही परतन्त्रता का भय।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ जनवरी अंक, 2001)