जड़ावर: हरेश्वर राय
जड़ावर: हरेश्वर राय
बात बहुत पहले की है। बिहार प्रान्त के शाहाबाद अंचल में एक छोटी सी जागीर थी। नाम था जगदीशपुर। उस जागीर के मालिक थे- बाबू कुँवर सिंह। उनकी भोजपुरी भाषी प्रजा आदर से उन्हें 'बाबू साहेब' कहा करती थी।
बाबू साहेब अत्यंत ही अख्खड़ मिजाज के व्यक्ति थे। वे अपनी बहादुरी, साहस, न्यायप्रियता एवं उदारता के लिए काफी लोकप्रिय थे। वे हमेशा अपनी प्रजा की भलाई के लिए तत्पर रहा करते थे। अतः उनके शासनकाल के दौरान जगदीशपुर में अमन-चैन का साम्राज्य कायम था तथा वहाँ की प्रजा सन्तुष्ट एवं खुशहाल थी।
बाबू साहेब के दरबार में बसावन नाम का एक मसखरा [विदूषक] रहा करता था। वह अत्यंत ही चालाक एवं कुशाग्र बुद्धि का व्यक्ति था। सभी दरबारी उसे बहुत चाहते थे। बाबू साहेब भी उसकी प्रतिभा के कायल थे।
फुर्सत के क्षणों में बसावन बाबू साहेब को चुटकुले, कहावतें, व्यंग्य कहानियाँ एवं कवितायें आदि सुनाकर उनका मनोरंजन किया करता था। उसकी बातें इतनी चुटीली होती थीं कि बाबू साहेब हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते थे। विषम परिस्थितियों में भी बाबू साहेब बसावन से सलाह-मशविरा किया करते थे।
बाबू कुँवर सिंह अपने सभी दरबारियों का विशेष ध्यान रखा करते थे। पर्व एवं त्यौहारों के अवसर पर उन्हें विशेष भत्ता देने की व्यवस्था थी। इतना ही नहीं बल्कि जाड़ा शुरू होते ही सभी दरबारियों को प्रति वर्ष जड़ावर [जाड़े के कपड़े] देने की भी परम्परा थी।
एक समय की बात है कि जाड़ा शुरू होते ही सभी दरबारियों को जड़ावर आवंटित कर दिया गया। परन्तु मसखरा बसावन जड़ावर पाने से वंचित रह गया क्योंकि आवंटन के दिन वह मुख्यालय में उपस्थित नहीं था। दरअसल उस दिन बाबू साहेब बसावन को अपने साथ लेकर जमुआँव के जंगल में शिकार करने चले गए थे।
कई दिनों के बाद वापस जगदीशपुर लौटने पर बसावन को अपने मित्रों द्वारा जड़ावर आवंटन की बात मालूम हुई। शायद खजांची भी अपनी व्यस्तता के कारण बसावन को जड़ावर देने की बात भूल गया था। दूसरी तरफ असावन संकोचवश अपने जड़ावर की बात बाबू साहेब के समक्ष रख नहीं पा रहा था। हाँ, वह अपनी बात रखने के लिए उचित मौके का इन्तजार अवश्य करने लगा।
कुछ ही दिनों के इन्तजार के बाद आखिर एक दिन उसे अपनी बात कहने का सुअवसर प्राप्त हो ही गया। इस अवसर का पूरा-पूरा फायदा उठाने के लिए वह कमर कसकर तैयार हो गया।
हुआ दरअसल यह कि गाजीपुर का एक प्रसिद्ध गंधी [इत्र बेचने वाला] बाबू साहेब के दरबार में आया। दरबार लगा हुआ था। बाबू साहेब की अनुमति लेकर गंधी उपस्थित दरबारियों को इत्र दिखाने लगा। इस क्रम में गंधी इत्र की शीशी में लगे ढक्कन की सहायता से एक-एक कर दरबारियों की हथेलियों के पिछले भाग पर इत्र लगाने लगा।
गंधी जब बसावन के पास पहुँचा तो उसने उसके सामने अपनी दोनों हथेलियाँ पसार दीं। गंधी ठिठक कर खड़ा हो गया। सभी दरबारी मुस्कुराने लगे।
'अरे हुजूर, इत्र हथेलियों पर नहीं बल्कि उनके पृष्ठभाग में लगाया जाता है।' गंधी ने चुटकी लेते हुए कहा।
'ठीक है, ठीक है, परन्तु तुम मेरी हथेलियों पर ही थोड़ा-सा इत्र दे दो।' बसावन ने प्रत्युत्तर दिया।
यह सुनकर गंधी ने मजाकिया अंदाज में उसकी हथेलियों पर इत्र की शीशी उड़ेल दी। बिना एक पल देर किए असावन अपनी हथेलियाँ ताबड़तोड़ अपने दोनों घुटनों पर मलने लगा। बाबू साहेब सहित सभी दरबारी हँसते-हँसते बेहाल हो गए।
'अरे भाई बसावन जी, सभी दरबारियों ने इत्र हाथ में लगवाया ताकि इत्र की सुगन्ध आसानी से ली जा सके परन्तु आपने इसे घुटनों में क्यों लगा लिया?' हँसी थमने पर बाबू साहेब ने पूछा।
'हुजूर, दरअसल जाड़ा का दिन है। जड़ावर के अभाव में पूरे शरीर को सिकोड़कर किसी तरह रातें काटनी पड़ रही हैं। मेरे घुटने रात भर मेरी नाक से सटे रहते हैं। इसीलिए मैंने अपने घुटनों में इत्र मल दिया ताकि रात भर इसकी सुगन्ध लेता रहूँ।' बसावन ने सफाई देते हुए कहा।
बाबू साहेब को बसावन की बात समझ में आ गई। उन्होंने तुरंत अपने खजांची को बुलवाकर बसावन को अविलम्ब जड़ावर देने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त दरबारियों का मनोरंजन करने के एवज में बाबू साहेब ने उसे पचास टके का नकद पुरस्कार भी दिया।
साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, मार्च (प्रथम) 2000 वर्ष:14 अंक: 16