तूफान सिंह: हरेश्वर राय
तूफान सिंह: हरेश्वर राय
बात पुरानी है। तब ग्वालियर रियासत के मालिक महाराज दौलतराव सिंधिया थे।
सिंधिया जी के दरबार में एक दिन एक सुन्दर नौजवान पहुँचा। उसने उनका अभिवादन किया और बोला- 'महाराज, मेरा नाम तूफान सिंह है। मैं आपकी सेना में सैनिक बनने की इच्छा लेकर हाजिर हुआ हूँ। मुझे विश्वास है कि आप मेरी इच्छा पूरी करेंगे।'
महाराज दौलतराव को अपनी सेना के लिए अधिक से अधिक सैनिकों की आवश्यकता थी। उस समय उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। अतः महाराज ने सेनापति जी से कहा- 'सेनापति जी, इस युवक की योग्यता की परीक्षा लेकर निर्णय लिया जाए।'
महाराज के आदेश का पालन करते हुए सेनापति जी ने युवक को अपने साथ दरबार के बाहर चलने को कहा। परन्तु युवक अपने स्थान पर ही खड़ा रहा। यह देखकर महाराज ने पूछा- 'क्या बात है युवक? क्या तुम कुछ कहना चाहते हो?'
'महाराज, मैं आपके सामने ही अपनी बहादुरी की परीक्षा देना चाहता हूँ।' युवक ने अत्यंत विनम्रता के साथ कहा।
'परन्तु यह सब भला यहाँ दरबार में कैसे संभव हो सकता है?' महाराज ने कहा।
'संभव है, महाराज, आदरणीय सेनापति जी के पास तलवार तो है ही। वे मुझ पर अपनी तलवार से वार करें और मैं अपना बचाव।' विश्वास पूर्वक युवक बोला।
युवक की बात सुनकर दरबार में उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए। वे महाराज का निर्णय सुनने के लिए उत्सुक हो उठे।
एक पल सोचकर महाराज ने कहा- 'सेनापति जी, इस युवक की इच्छा पूरी की जाए।'
महाराज का आदेश पाते ही सेनापति जी ने म्यान से तलवार खींची और बोले- 'सावधान हो जाओ युवक!'
इतना सुनते ही युवक बिजली की गति से बचाव की मुद्रा में आ गया। उसकी आँखें तलवार पर केन्द्रित हो गईं। बिना पलक झपकाए वह वार का इंतजार करने लगा।
सेनापति जी ने पहला वार किया। अत्यंत कुशलता के साथ युवक ने अपना बचाव किया। दूसरा वार किया, यह वार भी खाली गया। फिर तो सेनापति जी वार पर वार करने लगे। उधर युवक पैंतरा बदल-बदल कर उनका हर वार बेअसर करता रहा।
सेनापति जी पसीना से तर-बतर हो गए। इसी बीच पैंतरा बदलकर युवक ने हवा में छलांग लगाई और अत्यंत सफाई के साथ सेनापति जी के हाथ से तलवार झटक ली। सेनापति जी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। पूरा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
उसके बाद तूफान सिंह ने अदब के साथ महाराज एवं उपस्थित लोगों का अभिवादन किया। फिर सेनापति जी के चरणों में तलवार डाल दी और उनके चरण स्पर्श किए। सेनापति जी ने बहादुर युवक को गले लगा लिया। महाराज सिंधिया भी अत्यंत ही भाव विह्वल हो गए।
तूफान सिंह को महाराज की सेना में नौकरी मिल गई। तूफान सिंह। यथा नाम तथा गुण। युद्ध के मैदान में अपनी चमचमाती तलवार से वह तूफान खड़ा करता था। लखिया नाम की अपनी झबरी घोड़ी की पीठ पर सवार होकर जब वह युद्ध भूमि में पहुँचता था तो दुश्मन की सेना में अफरा-तफरी सी मच जाती थी। उसका नाम सुनकर अंग्रेज सिहर जाते थे।
तूफान सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर महाराज सिंधिया ने कुछ ही दिनों बाद उसकी पदोन्नति कर दी।
तूफान सिंह एक विचित्र सैनिक था। वह हमेशा ढीला-ढाला वस्त्र धारण करता था, तथा बहुत ही कम बोलता था। अक्सर वह सैनिकों से अलग-थलग ही सोया करता था। स्नान करते हुए तो किसी ने उसे देखा ही नहीं था। कुल मिलाकर उसका चरित्र रहस्यमयी लगता था।
एक बार की बात है कि तूफान सिंह युद्ध भूमि में बुरी तरह घायल हो गया। बेहोशी की हालत में उसे चिकित्सकों के पास पँहुचाया गया। चिकित्सा के दौरान चिकित्सक यह जानकर हैरान हो गए कि तूफान सिंह एक युवती है।
महाराज सिंधिया को जब इस सनसनीखेज रहस्य की जानकारी मिली तो वे स्तब्ध रह गए। वे तूफान सिंह से मिलने के लिए अत्यंत उत्सुक हो उठे।
महाराज जब घायल तूफान सिंह के पास पहुँचे तो वह होश में आ चुका था। महाराज को देखते ही वह मुस्कुराने लगा। महाराज भी मुस्कुराए। इसके बाद महाराज बोले- 'तूफान सिंह, हम तुम्हारी बहादुरी के कायल हैं। हाँ, यह बात जानने की उत्कंठा है कि तुमने हमसे अपनी असलियत क्यों छुपाई?
यह सुनते ही तूफान सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उसका भेद खुल चुका है।
अतः सत्य बात बताने में ही उसने अपनी भलाई समझी।
'महाराज, परिस्थितियों ने मुझे अपनी असलियत छिपाने के लिए मजबूर कर दिया था।' तूफान सिंह ने कहा।
'महाराज, मेरा नाम पद्मा सिंह है। मेरा एक जुड़वाँ भाई भी है। वह मेरा हमशक्ल है। अभी वह भोपाल महाराजा के कारागार में बन्दी का जीवन बीता रहा है।'
'महाराज, मेरे पिताजी आपकी सेना में एक बहादुर सैनिक थे। अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने हम दोनों भाई-बहनों को तलवार चलाना, घुड़सवारी करना, निशाना साधने आदि की शिक्षा दी थी।'
पद्मा सिंह ने आगे कहा- 'महाराज, पिताजी की मृत्यु के बाद हमारा परिवार कर्ज के भार से दब गया। माताजी गरीबी की मार बर्दाश्त नहीं कर सकीं और स्वर्ग सिधार गईं।'
'इसके बाद कर्ज लेनदारों ने मेरे भाई को तंग करना शुरू कर दिया। हम कर्ज चुकाने में सक्षम नहीं थे, महाराज। हमारा जीना हराम हो गया। एक कर्ज लेनदार ने मेरे भाई के खिलाफ भोपाल महाराज से शिकायत कर दी। परिणामतः उसे गिरफ्तार कर बन्दीगृह में डाल दिया गया।' पद्मा ने कहा।
इतना कहते-कहते पद्मा सिंह की आँखों में आँसू भर गए। भर-भराई आवाज में उसने आगे कहा- 'तब मैं पूर्णतः अकेली हो गई महाराज।'
'कर्ज चुकाकर मैंने अपने भाई को आजाद कराने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। स्त्रीवेश में यह कार्य संभव नहीं था, अतः पुरुष वेश धारण कर मैं आपकी सेना में भर्ती हो गई, ताकि वेतन से मिलने वाली राशि जमाकर अपने भाई को मुक्त करा सकूँ।' पद्मा सिंह ने बताया।
पद्मा के भ्रातृ-प्रेम की कहानी सुनकर महाराज अत्यंत ही प्रभावित हो गए। अपने एक दूत के माध्यम से उन्होंने भोपाल महाराज के पास कर्ज की रकम भिजवाई और पद्मा के भाई को मुक्त कराकर ग्वालियर बुलवाया।
पद्मा का भाई पद्मा से भी बहादुर निकला। अतः महाराज सिंधिया ने उसे अपनी सेना में एक उच्च पद पर नियुक्त कर दिया तथा पद्मा की शादी एक उच्च सेनाधिकारी से कर दी।
(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, नवम्बर (प्रथम) 98; वर्ष:13, अंक 8)