सजा मुझे चाहिए: हरेश्वर राय
सजा मुझे चाहिए: हरेश्वर राय
एक गाँव था। वहाँ एक प्राथमिक विद्यालय था। उसमें नरेन नाम का एक लड़का पढ़ता था। नरेन अत्यंत ही चंचल स्वभाव का था। उसकी बुद्धि प्रखर थी तथा वह बहुत बातूनी भी था। विद्यालय के गुरुदेव ने कबड्डी की एक टीम बना रखी थी। नरेन उस टीम का कप्तान था। गुरुदेव प्रतिदिन खेलकूद के कालांश में इस टीम को प्रशिक्षण दिया करते थे एवं अभ्यास कराया करते थे। हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी प्रखंड स्तरीय बाल कबड्डी प्रतियोगिता का आयोजन होने वाला था। इस प्रतियोगिता को ध्यान में रखते हुए गुरुदेव तैयारी में जुटे हुए थे।
निश्चित तिथि को प्रखंड मुख्यालय के खुले प्रांगण में कबड्डी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। प्रखंड के सभी प्राथमिक विद्यालयों की टीमें इस प्रतियोगिता में भाग लेने आई। प्रतियोगिता के दौरान नरेन की टीम के खिलाड़ियों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। वह तो एक मात्र नरेन था जिसके उत्कृष्ट प्रदर्शन की बदौलत उसकी टीम प्रखंड में प्रथम स्थान प्राप्त कर सकी। कबड्डी, कबड्डी..... बोलते हुए नरेन जब विरोधी टीम पर आक्रमण करता था तो उसकी स्फूर्ति देखते ही बनती थी। उसे प्रखंड का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी होने का गौरव भी प्राप्त हुआ।
नरेन के अतिरिक्त टीम के अन्य सभी खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन के कारण गुरुदेव अत्यंत ही क्षुब्ध थे। अतः अगले दिन प्रार्थना संपन्न होने के तुरंत बाद गुरुदेव ने नरेन के अतिरिक्त अन्य सभी खिलाड़ियों को अपने पास बुलाया और कहा- "कल के खराब प्रदर्शन के लिये तुम्हें सजा दी जाती है कि तुम लोग अपने-अपने कान पकड़कर पचास बार उठक-बैठक करो।"
गुरुदेव का फैसला सुनते ही बालक नरेन भी वहाँ पहुँचा और उठक-बैठक में शामिल हो गया।
नरेन को उठक-बैठक करते हुए देखकर गुरुदेव ने कहा- "बेटे नरेन, तुम क्यों उठक-बैठक कर रहे हो? तुम तो हमारे विद्यालय की शान हो। तुम्हारे अच्छे प्रदर्शन के कारण ही तो इस विद्यालय की नाक कटने से बच पाई। तुम सजा के नहीं पुरस्कार के पात्र हो। अतः जाओ और अपने स्थान पर खड़े हो जाओ।"
"नहीं गुरुदेव, सजा पाने का असली हकदार तो मैं हूँ। टीम के अन्य खिलाड़ी तो पूर्णतः निर्दोष हैं।" नरेन ने कहा।
"परन्तु यह कैसे नरेन?" आश्चर्यचकित होकर गुरुदेव ने पूछा।
"गुरुदेव, टीम का कप्तान तो मैं था। किसी टीम के अच्छे और बुरे प्रदर्शन की जिम्मेदारी तो कप्तान के ऊपर होती है ना। अतः सजा तो मुझे मिलनी चाहिये, ना कि टीम के अन्य खिलाड़ियों को।" नरेन ने सफाई दी।
नरेन की बात सुनकर गुरुदेव भाव-विभोर हो गए। उन्होंने नरेन को गोद में उठा लिया और उसकी पीठ थपथपाने लगे। सभी खिलाड़ियों को माफ करते हुए गुरुदेव ने कहा- "बच्चों, मेरी बात जरूर याद रखना। देखना, नरेन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।"
यही बालक नरेन बाद में स्वामी विवेकानन्द के नाम से विश्वविख्यात हुआ।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ जनवरी अंक 1999)