मास्टरजी का कुर्ता-पाजामा: हरेश्वर राय
मास्टरजी का कुर्ता-पाजामा: हरेश्वर राय
एक था छोटा-सा गाँव जमुआँव। वहाँ एक प्राथमिक विद्यालय था। उस विद्यालय में प्रथम से पंचम कक्षा तक की पढ़ाई की व्यवस्था थी। मजेदार बात यह थी कि विद्यालय के नाम पर सिर्फ एक ही कमरा था। वह इकलौता कमरा भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। इसी कमरे में सभी कक्षाएँ एक साथ चलती थीं।
विद्यालय के कमरे के एक कोने में काठ का एक पुराना-सा बक्सा पड़ा था। वही बक्सा विद्यालय के कार्यालय की भूमिका अदा करता था। विद्यालय की छुट्टी होने पर विद्यालय के रजिस्टर, चाक, डस्टर, घड़ी, झाडू तथा घंटी एवं हथौड़ी आदि सामग्रियाँ इसी बक्से में सलीके से रख दी जाती थीं।
फर्नीचर के नाम पर विद्यालय में लकड़ी की एक जर्जर कुर्सी के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। वह कुर्सी भी बैठने पर डगमग-डगमग डोलती थी। विद्यालय के बच्चों ने उसे मास्टरजी की ‘चकुनी हाथी’ की संज्ञा दे रखी थी। बैठने के लिए छात्र अपने-अपने घर से टाट-पट्टियाँ लेकर आया करते थे।
विद्यालय के सामने एक छोटा-सा उद्यान था। वह उद्यान काफी हरा-भरा एवं सुन्दर था। उसकी क्यारियों में हमेशा ही रंग-बिरंगे फूल हँसते-मुस्कुराते नजर आते थे। सभी कक्षाओं के छात्रों के लिए अलग-अलग क्यारियाँ आवंटित की गई थीं। अतः सभी कक्षाओं के छात्र अपने-अपने बागवानी के कालांश में अपनी-अपनी क्यारियों में भरपूर लगन के साथ काम करते थे।
इस विद्यालय के इकलौते शिक्षक थे- सहदेव नारायण जी। आदर से सभी लोग उन्हें मास्टरजी कहते थे। मास्टरजी का घर विद्यालय से थोड़ी ही दूरी पर स्थित था। मास्टरजी के अतिरिक्त उनके परिवार में दो अन्य सदस्य और थे। एक थीं उनकी पत्नी एवं दूसरी उनकी दस वर्षीय बेटी अनुपमा।
वैसे तो मास्टरजी की उम्र पचास साल के आसपास थी परन्तु देखने में वे सत्तर-पचहत्तर से कम के नहीं लगते थे। दुबले-पतले पौने छह फीट लम्बे मास्टरजी खादी का झक सफेद कुर्ता पाजामा पहनने के बहुत शौकीन थे। मोटे-मोटे शीशों वाला चश्मा हमेशा उनकी नाक पर सवार ही रहता था। वे बहुत ही कम बोलते थे। हँसना-मुस्कुराना तो शायद वे जानते ही नहीं थे। चलते समय उनके पैरों के फुदनेदार चमरौधे जूते परर्चों-परर्चों की धुन बजाते रहते थे।
प्रधानाध्यापक से लेकर चपरासी तक की भूमिकाएँ सफलतापूर्वक अदा करने वाले मास्टरजी समय के बहुत पाबंद थे। मौसम चाहे कोई भी हो वे एकदम ठीक समय पर विद्यालय पहुँच जाते थे। यह बात उनके उच्चाधिकारी भी अच्छी तरह जानते थे।
एक दिन की बात है कि मास्टरजी के नाम विद्यालय में एक सरकारी चिट्ठी आई। चिट्ठी के अनुसार अगले ही दिन विद्यालय के निरीक्षण के लिए निरीक्षकों का एक दल आने वाला था। अतः मास्टरजी ने विद्यालय के छात्रों को भी यह सूचना दी तथा अगले दिन ठीक समय पर साफ-सुथरे कपड़े पहनकर विद्यालय आने की हिदायत दी।
सरकारी पत्र क्या आया कि पूरे विद्यालय में हलचल सी मच गई। पढ़ाई का कार्यक्रम स्थगित कर वृहद साफ-सफाई का कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। विद्यालय के कमरे की कच्ची फर्श गोबर से लीपी गई। कुर्सी एवं काठ के बक्से को गीले कपड़े से पोंछकर चमकाया गया। विद्यालय की दीवारों पर लटकी महापुरुषों की तस्वीरों पर जमी धूल झाड़ी गई। सामने वाले उद्यान की भी सफाई की गई। एक-एक चीज की सफाई हो जाने के बाद मास्टरजी संतुष्ट हो गए। उसके बाद मास्टरजी ने नियत समय पर छुट्टी की घंटी बजाई एवं झटपट विद्यालय बंद कर घर पहुँचे।
नाश्ता-पानी करने के बाद रोज की तरह मास्टरजी बाजार चल पड़े। जितौरा नाम का यह बाजार उनके गाँव से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। रास्ते में मास्टरजी के दिमाग में यह विचार आया कि निरीक्षक दल पर अच्छा प्रभाव जमाने के लिए नया कुर्ता-पाजामा सिलवाना काफी अच्छा रहेगा। यह विचार आते ही मास्टरजी की आँखों में चमक आ गई एवं उनकी चाल में तेजी आ गई।
लपकते हुए वे बाजार पहुँचे और सीधे महंगू सेठ की दुकान में प्रविष्ट हो गए। कपड़ा खरीदकर शीघ्रता के साथ वे अपने खास दर्जी टूट्टू मियाँ के यहाँ जा पहुँचे। तब साढ़े पाँच बजने वाले थे। जाड़े का मौसम होने के कारण सूरज बस डूबने ही वाला था। टूट्टू मियाँ दुकान बंद करने की तैयारी में व्यस्त थे।
सूर्यास्त के बाद बिजली के अभाव में टूट्टू मियाँ के लिए सिलाई का कार्य करना संभव नहीं हो पाता था। ढिबरी जलाकर काम करने में उन्हें बहुत ही असुविधा होती थी। उम्र भी तो साठ पार कर चुकी थी। आँखे एकदम कमजोर हो चली थीं। चश्मे की बदौलत किसी तरह काम भर चल रहा था।
मास्टरजी को देखते ही टूट्टू मियाँ ने सलामी ठोकी और उनके पधारने का प्रयोजन पूछा। मास्टरजी ने यथास्थिति बतला दी।
'वाह मास्टरजी, वाह, आप भी कमाल करते हैं। कल सुबह आपके विद्यालय में पदाधिकारीगण पधार रहे हैं और आप देर शाम कुर्ता-पाजामा सिलवाने पधारे हैं। यह तो आग लग जाने पर कुआँ खोदने वाली बात हुई न।' टूट्टू मियाँ ने आत्मीयता से कहा।
'अरे नहीं मियाँ, नहीं। दरअसल अधिकारियों के आगमन की सूचना तो मुझे आज ही मिली है।' मास्टरजी ने स्पष्ट किया।
अनिच्छा के बावजूद टूट्टू मियाँ मास्टरजी की बात नहीं टाल सके। अतः हड़बड़ी में उन्होंने मास्टरजी की नाप ले ली तथा देखते ही देखते कपड़े की कटिंग भी कर डाली। उसके बाद ढिबरी जलाते हुए मजाकिया अंदाज में बोले- 'मास्टरजी, सिलाई में कुछ ऊँच-नीच हो जाए तो मुझे दोष मत देना।'
'अरे मियाँ, कैसी बात कर रहे हो? ऐसा कभी किया है मैंने।' मास्टरजी ने कहा।
टूट्टू मियाँ ने तो फिर ऐसी फुर्ती दिखलाई कि मास्टरजी का कुर्ता-पाजामा तैयार होने में कोई खास विलंब नहीं हुआ। कुर्ता-पाजामा तैयार कर उन्होंने एक अखबार के टुकड़े में लपेटा और मास्टरजी को सौंप दिया।
कुर्ता-पाजामा लेकर मास्टरजी जब घर पहुँचे तो रात के भोजन का समय हो गया था। अतः हाथ-पैर धोने के बाद उन्होंने रात का खाना खाया और बिस्तर पर लेट गए। अगले दिन के बारे में सोचते-सोचते पता नहीं कब उन्हें नींद आ गई।
अगले दिन मास्टरजी की आँखें थोड़ी देर से खुलीं। तब छः बज रहे थे। शनिवार का दिन होने के कारण विद्यालय लगने का समय साढ़े सात था। अतः शौच आदि से निवृत होकर मास्टरजी ने अखबार के टुकड़े में लपेटा हुआ कुर्ता-पाजामा लिया और विद्यालय की तरफ लपके। मन ही मन उन्होंने ऐन मौके पर नया कुर्ता-पाजामा धारण करने का निर्णय कर लिया था।
विद्यालय पहुँचकर झटपट मास्टरजी ने विद्यालय में झाडू लगाया एवं नियत स्थान पर घंटी टांग दी। लोटा-ग्लास चमकाकर उन्होंने उसे काठ के बक्से पर रख दिया। फिर दातुन करने के बाद उन्होंने विद्यालय के हैंडपम्प पर स्नान किया। सर पर बाल तो थे नहीं अतः कंधी करने की झंझट भी नहीं करनी पड़ी।
देखते ही देखते विद्यालय लगने का समय हो गया। मास्टरजी ने टनटन-टनटन घंटी बजाई। घंटी बजते ही विद्यालय के छात्र प्रार्थना करने के लिए विद्यालय के सामने पंक्तिबद्ध हो गए। उसके बाद प्रार्थना प्रारम्भ हुई 'वर दे, वर दे, वीणा वादिनी वर दे....।'
प्रार्थना ज्योंही समाप्त हुई कि दूर से आती हुई एक जीप दिखाई पड़ी। बच्चों को ज्यों का त्यों खड़ा रहने का आदेश देकर मास्टरजी झटपट कमरे की ओर मुड़े और फुर्ती के साथ नया कुर्ता-पाजामा धारण कर बाहर निकल आए। उनकी अनोखी पोशाक देखकर पंक्तिबद्ध छात्र अपनी-अपनी हथेलियों से अपना-अपना मुँह छिपाकर मुस्कुराने लगे। परन्तु अपनी तरफ से पूरी तरह से बेखबर मास्टरजी का ध्यान आती हुई जीप पर केन्द्रित था।
जीप विद्यालय के पास आकर रुक गई। एक-एक कर जीप में सवार अधिकारी नीचे उतरे। हाथ जोड़े खड़े मास्टरजी पर नजर पड़ते ही अधिकारी मुस्कुराने लगे। पल दो पल में ही मुस्कराहटों ने ठहाकों का रूप धारण कर लिया। अधिकारियों के साथ-साथ पंक्तिबद्ध बच्चे भी जोर-जोर का ठहाका लगाने लगे।
मास्टरजी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। साहस करके उन्होंने अधिकारियों से पूछा- 'सर, मुझे देखकर आप लोग इस तरह क्यों हँस रहे हैं?'
अपनी हँसी रोकते हुए एक अधिकारी ने कहा- 'अरे मास्टरजी आपने किसी नाटक कंपनी के जोकर का यह ड्रेस क्यों पहन रखा है? पाजामा घुटने तक लटक रहा है। कुर्ते की बाँहें नदारद हैं। जेबें पीछे की ओर लगी हुई हैं।'
'सर, यह सब मेरी हड़बड़ी का नतीजा है।' मास्टरजी ने अपने आपको निहारते हुए कहा।
कुछ ही पल में मुस्कुराने से भी परहेज करने वाले मास्टरजी अजीब-सा मुँह बनाते हुए ठहाका पर ठहाका लगाने लगे। हँसने का उनका अंदाज इतना अनोखा था कि पुनः एक बार ठहाकों का फव्वारा फूट पड़ा। ठहाकों के बीच मास्टरजी कुछ और भी कहने का प्रयास कर रहे थे। परन्तु वहाँ 'हा-हा-हा-हा', ही-ही-ही-ही, हू-हू-हू-हू' के अतिरिक्त कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था।
(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, फ़रवरी (द्वितीय) 99; वर्ष: 13, अंक 15)