गीता का बीसवाँ अध्याय: हरेश्वर राय
गीता का बीसवाँ अध्याय: हरेश्वर राय
बहुत पहले की बात है। भोजपुर अंचल में डिहरा नाम का एक छोटा सा गाँव था। गाँव के बाहर था एक भव्य मंदिर। इस मंदिर के प्रांगण में पीपल का एक विशाल वृक्ष था। उसके नीचे एक पक्का ओटला था।
एक बार की बात है कि एक संत जी महाराज ने इस वृक्ष के नीचे अपना आसन डाला। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था तथा उनकी वाणी अत्यंत मधुर थी। ग्रामीण संतजी महाराज से अत्यंत प्रभावित हो गए। उन्होंने उनसे प्रवचन करने का आग्रह किया जिसे वे ठुकरा न सके।
अगल-बगल के गाँवों में इस आशय की सूचना भिजवाई गई। मंच बनाया गया। प्रवचन के लिए अन्य सारी आवश्यक व्यवस्था की गई। प्रवचन प्रारम्भ होने के दिन मंदिर के प्रांगण में अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई।
प्रवचन प्रारम्भ करने के पहले संत जी महाराज ने उपस्थित श्रोताओं से एक सवाल पूछा- “आप लोगों में से कितने लोगों ने गीता का बीसवाँ अध्याय पढ़ा है या सुना है? कृपया हाथ ऊपर करें।” यह सुनकर लगभग सभी लोगों ने हाथ ऊपर उठा दिए। संतजी महाराज का हृदय करूणा से भर गया। संत जी महाराज ने आगे कहा- “अरे वाह! आप लोग तो प्रबुद्ध श्रोता हैं। अब मुझे गीता पर प्रवचन करने में असुविधा नहीं होगी।” इसी बीच एक दस वर्षीय बालक मंच पर आ पहुँचा। यह देखकर महात्माजी ने उससे पूछा- “क्या बात है बेटे? कुछ कहना चाहते हो?” बालक ने कहा- “महाराज, ये सभी लोग झूठ बोल रहे हैं। मेरी पुस्तक में लिखा हुआ है कि गीता के कुल अट्ठारह अध्याय हैं। फिर इन लोगों ने बीसवाँ अध्याय कहाँ से पढ़ लिया।”
बालक की बात सुनकर उपस्थित लोग शर्म से पानी-पानी हो गए और संत जी महाराज मुस्कुराने लगे।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ जून अंक, 1999)