शेरनी: हरेश्वर राय

शेरनी: हरेश्वर राय

कानपुर के पास एक छोटी सी रियासत थी। रियासत के राजा सज्जनजी वीर, साहसी एवं स्वाभिमानी थे। उनके ताज नाम की एक लड़की थी।

बचपन से ही उसे तलवार चलाने तथा घुड़सवारी करने का शौक था। उसकी निर्भीकता एवं आत्मविश्वास के कारण उसके पिताजी प्यार से उसे शेरनी के नाम से पुकारते थे। उसने अपनी छोटी-छोटी सहेलियों की एक छोटी सी सेना बना ली थी। यह सेना प्रतिदिन नकली युद्ध का अभ्यास किया करती थी।

उन दिनों कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का बादशाह था।

उसके सिर पर हमेशा राज्य विस्तार का भूत सवार रहा करता था। सज्जनजी की रियासत पर भी उसकी वक्र दृष्टि पड़ ही गई, अतः उसने अपने एक दूत के माध्यम से रियासत के राजा के पास अपनी अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा। राजा तिलमिला उठे। उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया और दूत के सामने ही ऐबक को बुरा भला भी कहा।

लौटकर दूत ऐबक के दरबार में पहुँचा। नमकमिर्च लगाकर उसने सारी घटना का ब्योरा प्रस्तुत किया। ऐबक आगबबूला हो गया। अपनी सेना लेकर वह रियासत की ओर चल पड़ा। अन्ततः लूटपाट करता हुआ वह रियासत के किले के मुख्य दरवाजे के सामने खुले मैदान में आ पहुँचा।

ऐबक की सेना के आगमन की सूचना मिलते ही सज्जनजी अपनी सेना लेकर युद्धभूमि में उतर आए। दोनों सेनाओं के आमने-सामने आते ही भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया। राजा की सेना के मुट्ठी भर सैनिकों ने वीरता के साथ शत्रु की सेना का मुकाबला किया।

एक-एक कर सैनिक देश के काम आने लगे। थोड़ी ही देर में गिने चुने सैनिक शेष रह गए। सज्जनजी को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब उनकी प्राण रक्षा मुश्किल है। अतः उन्होंने मन ही मन तय किया कि ऐबक के नापाक हाथों से मरने के बजाए स्वयं ही प्राणांत करना ज्यादा उचित होगा।

राजा अभी सोच ही रहे थे कि उनकी नजर शेरनी पर पड़ी। उन्होंने देखा कि पच्चीस-तीस किशोरियाँ वीर वेश में उसके पीछे-पीछे युद्धभूमि की तरफ बढ़ती चली आ रही हैं।

सभी के हाथों में तलवारें चमक रही हैं। यह दृश्य देखकर वे आश्चर्य चकित रह गए।

शेरनी की सेना ने शत्रु की सेना पर धावा बोल दिया। शेरनी बिजली की गति से तलवार चलाने लगी। कई सैनिक धराशायी हो गए। इस बहादुर किशोरी का कमाल देखकर ऐबक भी कुछ पल के लिए ठगा सा रह गया।

थोड़ी देर बाद ऐबक शेरनी के नजदीक आ पहुँचा और गरजते हुए बोला, 'लड़की! तुम्हें अपने इस हठ का परिणाम मालूम है?'

'हाँ, हाँ मालूम है। यदि मेरी सेना विजयी होगी तो जश्न मनाया जाएगा या फिर हम अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए शहीद हो जाएंगे।' शेरनी ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया।

शेरनी का उत्तर सुनकर ऐबक स्तब्ध रह गया। उसने अपने सैनिकों को युद्ध बंद करने का आदेश दिया। युद्ध बंद होने के बाद उसने शेरनी से कहा, 'बेटी, तुम्हारी बहादुरी और तुम्हारे उच्च विचारों ने मुझे पराजित कर दिया है।

अपनी हार स्वीकार करते हुए मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि प्रत्येक माँ बाप को तुम्हारी जैसी संतान प्राप्त हो।'

ऐबक की सेना वापस लौट गई। सज्जनजी ने अपनी शेरनी को गले से लगा लिया। उसकी जय- जयकार के नारे से पूरी रियासत गूँज उठी।

(साभार: राजस्थान पत्रिका प्रकाशन पाक्षिक; बालहंस, मार्च (द्वीतीय) 98; वर्ष:12, अंक 17)

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