आत्मविश्वास लौट आया: हरेश्वर राय
आत्मविश्वास लौट आया: हरेश्वर राय
शाम का समय था। साढ़े पाँच बजे थे। समीर विद्यालय से वापस लौटा। कपड़े बदलकर उसने हाथ-मुँह धोये। जलपान करने के बाद रोज की तरह वह बालकनी में पड़ी आरामकुर्सी पर जा बैठा।
बालकनी के सामने वाले मैदान में ढेर सारे बच्चे खेल रहे थे। दूर आकाश में रंग-बिरंगी पतंगे उड़ रही थीं। विभिन्न प्रकार के पक्षी आकाश मार्ग से अपने-अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे। सूरज भी बस अब डूबने ही वाला था। आकाश लाल हो चुका था। शाम का दृश्य देखते-देखते आठवीं कक्षा का तेरह वर्षीय समीर विचारों में खो सा गया।
“मेरी वार्षिक परीक्षा शुरू होने में अब मात्र तीन माह शेष हैं। परीक्षा की तैयारी में मुझे जी-जान से लग जाना चाहिए। सफलता प्राप्त करने के लिए मुझे कठिन परिश्रम करना होगा।”
“परन्तु क्या मैं इस वर्ष भी परीक्षा पास कर पाऊँगा? नहीं, नहीं। मेरे लिए परीक्षा पास करना टेढ़ी खीर है, असंभव है। निराशा की गिरफ्त में जकड़ा वह सोचता चला गया।
“गत वर्ष भी तो मैंने कठिन परिश्रम किया था। क्या परिणाम निकला? फेल तो हो गया था। मात्र बीस प्रतिशत अंक आए थे। मेरा परिणाम जानकर मम्मी अत्यंत निराश हो गई थीं। कई दिनों तक उसने खाना नहीं खाया था। पापाजी ने मेरी खूब धुनाई की थी। तभी से वे मुझसे सीधे मुँह बात तक नहीं करते। मुझे देखते ही उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। उनके सामने पड़ते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
समीर सोचता रहा, “विद्यालय में मेरे शिक्षक भी मुझे उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं। मेरे सहपाठी भी मुझे ताना देते हैं। वे मुझे मलूकादास कहकर चिढ़ाते हैं।”
“बच्चू समीर, यदि इस बार परीक्षा में पास नहीं हुए तो परिणाम अत्यंत ही भयंकर होगा। पापाजी तो हड्डी-पसली एक करके रख देंगे। मम्मी तो रो-रोकर परेशान हो जाएगी।”
“परन्तु मैं कर ही क्या सकता हूँ। सभी तो यही कहते हैं कि मेरी स्मरण शक्ति अत्यंत कमजोर है। मैं एक मंदबुद्धि बालक हूँ।
यह बात सही भी तो है। मैं कोई भी बात लम्बे समय तक याद ही नहीं रख पाता। परीक्षा भवन में पहुँचते ही मैं सब कुछ भूल जाता हूँ। मेरी घबराहट बहुत बढ़ जाती है, मेरे हाथ-पैर काँपने लगते हैं तथा कुछ लिख ही नहीं पाता।”
समीर सोचता रहा, “मैं परीक्षा में कभी भी पास नहीं हो सकता। मैं पूर्णतः अक्षम हूँ। मैं पढ़ाई करने योग्य तो कतई नहीं हूँ। मुझे पढ़ाई छोड़ ही देना चाहिए। मैं कभी पास नहीं कर सकता। नहीं कर सकता ...।”
कालबेल की आवाज ने समीर का ध्यान भंग कर दिया। तभी दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई पड़ी और तुरंत ही मम्मी की आवाज आई, “अरे बेटा समीर, देखो तो कौन आया है?”
दौड़कर समीर जब दरवाजे तक पहुँचा तो उसकी आँखों में चमक आ गई। “अरे मामाजी आप।” मामाजी का चरण स्पर्श करते हुए समीर ने कहा।
“हाँ भाई मैं। परन्तु तुम माँ-बेटा मुझे भीतर भी चलने के लिए कहोगे या दरवाजे पर ही खड़ा रखोगे?” मुस्कुराते हुए उन्होंने पूछा और कमरे में प्रवेश कर सोफे पर बैठ गए।
मामाजी के बैठते ही समीर ने कहा, “मामाजी, आप हर बार मात्र दो-चार दिन के लिए आते हैं और चले जाते हैं, इस बार तो मैं आपके साथ जी भरकर खेलूंगा और पन्द्रह दिन के पहले तो कदापि नहीं जाने दूंगा।”
“पन्द्रह दिन ही क्यों भांजे, अब तो मैं स्थाई रूप से यहीं रहूंगा। इस शहर में तबादला हो गया है मेरा। हा-हा-हा!” ठहाका लगाते हुए मामाजी ने कहा।
इतना सुनना था कि समीर की बाँछें खिल गईं। हवा में हाथ लहरा-लहराकर उसने जोर-जोर से “मामाजी जिन्दाबाद” के नारे लगाना शुरू कर दिया।
समीर के मामाजी का नाम था - उपेन्द्र बाबू। उनकी आयु पचास के आस-पास थी। वे स्वास्थ्य विभाग में क्लर्क थे। उन्हें कोई संतान नहीं थी। बहुत वर्ष पूर्व उनकी पत्नी भी चल बसी थी। उन्होंने दोबारा शादी नहीं की। वे पूर्णतः अकेले थे।
उपेन्द्र बाबू एक जिंदादिल इंसान थे। वे कभी उदास नहीं रहते थे। वे इतने हँसोड़ थे कि बात-बात पर दिल खोलकर ठहाका लगाते थे। उनके पास चुटकुलों का ऐसा समृद्ध खजाना था कि हर समय वे चुटकुलों की फुहार छोड़ते ही रहते थे।
समीर और उपेन्द्र बाबू के बीच बातें चल ही रही थी कि समीर के पापाजी जीतू बाबू आ गए। उपेन्द्र बाबू पर नजर पड़ते ही वे गद्गद् हो गए। दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन कर एक दूसरे का कुशल-क्षेम पूछा। पापाजी के आते ही समीर दबे पाँव वहाँ से खिसक गया।
जीतू बाबू पटना उच्च न्यायालय के एक जाने-माने अधिवक्ता थे। उपेन्द्र बाबू से उन्हें गहरा लगाव था। वे उन्हें भाई साहब कहकर संबोधित करते थे। उपेन्द्र बाबू के तबादले की सूचना पाकर तो उन्हें ऐसा लगा मानों उन्हें कोई खजाना ही मिल गया हो।
रात का खाना खाने के बाद दोनों आपस में बातें करने लगे। थोड़ी ही देर बाद उनकी बातचीत समीर पर केन्द्रित हो गई। जीतू बाबू कहने लगे - “भाई साहब, समीर के भविष्य को लेकर तो मैं काफी परेशान हूँ। हैरानी तो इस बात की है कि वह छठी कक्षा में था तो प्रथम आया था। पता नहीं सातवीं कक्षा में पहुँचते ही उसे क्या हो गया। वह नीचे ही नीचे लुढ़कता चला जा रहा है।”
“आपका यह भांजा एक बार सातवीं और एक बार आठवीं में फेल हो चुका है। इस साल भी उसके पास होने की उम्मीद कम ही है। उसके लिए मैंने हर प्रकार की व्यवस्था की। मैंने खुद पढ़ाया, ट्यूटर रखा, परन्तु सब व्यर्थ।” उन्होंने कहा।
जीतू बाबू ने आगे कहा - “विद्यालय के शिक्षकों का कहना है कि उसकी स्मरण शक्ति अत्यंत कमजोर है। कक्षा में पढ़ाई के समय वह या तो शांत बैठा रहता है या इधर-उधर देखता रहता है। कभी-कभी तो वह बिना मतलब हँस भी देता है।”
“वैसे तो समीर अत्यंत आज्ञाकारी है। समय से विद्यालय जाता है। शरारत भी न के बराबर करता है। पढ़ाई पर काफी समय भी देता है परन्तु उसे कुछ याद ही नहीं होता।” जीतू बाबू ने उन्हें अपनी व्यथा बताई।
उपेन्द्र बाबू ने उन्हें ढाढस बंधाते हुए कहा - “अरे जीजाजी, सब ठीक हो जाएगा। अब मैं आ गया हूँ न। समीर पुनः अपनी कक्षा में प्रथम आएगा।”
अगले दिन से मामाश्री और भांजे आनंद से रहने लगे। सुबह-शाम उनका खेल शुरू हो गया। रोज सुबह स्नान करने के पूर्व दोनों में मल्लयुद्ध होता था। अंततः मामाश्री को पटखनिया खानी पड़ती थी। शाम को दौड़ प्रतियोगिता होती तो मामाश्री हर बार पीछे ही रह जाते थे। विजय समीर की ही होती थी। समीर से हारने में उपेन्द्र बाबू को जीत का ही आनंद आता था।
मामाजी को हराकर विजय प्राप्त करने में समीर को बहुत आनंद आता था। उसमें आत्मविश्वास का संचार होता था। उसे गर्व की अनुभूति होती थी।
खेल के बाद पढ़ाई का दौर शुरू होता था। शुरू-शुरू में उपेन्द्र बाबू समीर को मनोरंजक कहानियाँ सुनाने लगे। इसके बाद उन्होंने समीर से उन कहानियों के पात्रों एवं घटनाओं के बारे में सवाल पूछना शुरू किया। समीर उनके हर सवाल का सही जवाब दे दिया करता था।
समीर द्वारा जवाब दे दिए जाने पर उपेन्द्र बाबू उसे खूब शाबाशी देते थे तथा उसकी खूब प्रशंसा करते थे।
धीरे-धीरे बात कहानियों से समीर के पाठ्यक्रम तक पहुँच गई। आरंभ में तो समीर डरा परन्तु कुछ दिनों में उसका डर समाप्त हो गया। मामाजी उसे जो भी पढ़ाते थे वह आराम से समझ लेता था। उसे जो प्रश्न दिया जाता उसका सही उत्तर लिखकर तुरंत दिखा देता था। इसके एवज में उसे मामाजी की वाहवाही प्राप्त होती थी। अब समीर का खोया हुआ आत्मविश्वास पुनः लौट चुका था।
तीन माह बाद जब परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो समीर प्रथम आया। उपेन्द्र बाबू ने अपनी सफाचट मूछों पर ताव देते हुए जब इस बात की सूचना जीतू बाबू को दी तो वे समीर को गोद में उठाकर नाचने लगे।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ अप्रैल अंक, 2001)