बाघ की सवारी: हरेश्वर राय
बाघ की सवारी: हरेश्वर राय
एक छोटा परन्तु घना जंगल था। जंगल के उस पार एक छोटी नदी थी। हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी माघी पूर्णिमा के दिन इसके तट पर भव्य उत्सव का आयोजन किया गया था। महोबा की प्रजा उत्सव में भाग लेने के लिए वहाँ एकत्रित हो रही थी। दोपहर तक अच्छी-खासी भीड़ इकट्ठी हो गई।
उत्सव स्थल दुल्हन की भाँति सजाया गया था। उत्सव का श्रीगणेश करने के लिए वहाँ के राजा अपनी पुत्री दुर्गा के साथ पधार चुके थे। उत्सव बस शुरु ही होने वाला था कि खून से लथपथ एक आदमी भागता हुआ मंच के पास पहुँचा। उसे देखते ही अफरातफरी मच गई। राजा के पूछने पर उस घायल व्यक्ति ने कहा, “हुजूर, मैं जंगल के रास्ते से होकर उत्सव में भाग लेने आ रहा था। मैं अकेला था। जंगल के मध्य में एक बाघ ने मेरे ऊपर हमला कर दिया। किसी तरह जान बचाकर मैं भाग पाने में सफल हो पाया हूँ।”
घायल व्यक्ति की बात सुनकर दुर्गा की भुजाएँ फड़कने लगीं। उसने बाघ को मार गिराने का निश्चय किया। वह अदम्य साहस एवं आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति थी। वह तीर चलाने एवं घुड़सवारी करने में निपुण थी। जोखिम एवं चुनौतियों से खेलना उसे अच्छा लगता था।
उत्सव शुरू हो गया। दुर्गा इतनी उतावली थी कि उसे एक पल बिताना भी कठिन प्रतीत हो रहा था। अतः अपने पिता की आँखें बचाकर वह जंगल की तरफ रवाना हो गई। जंगल में प्रवेश करते ही वह सजग एवं सावधान हो गई। धनुष पर तीर चढ़ाकर वह बाघ की तलाश में जुट गई। थोड़ी ही देर बाद उसे एक भारी-भरकम एवं भयानक बाघ दिखाई पड़ा। वह उसकी तरफ बढ़ता चला आ रहा था। दुर्गा अत्यंत चौकन्नी हो गई।
धीरे-धीरे दुर्गा और बाघ के बीच का फासला कम होता चला गया। अब दोनों एकदम आमने-सामने खड़े थे। दुर्गा ने उससे आँखें मिलाईं। यह एक रोमांचक क्षण था। बाघ गुर्राया और पीछे हटने लगा। दुर्गा को यह समझते देर नहीं लगी कि बाघ हमला करने के लिए पूरी तरह तैयार है। एक पल की चूक भी खतरनाक साबित हो सकती थी। अतः बाघ के छलांग लगाने के पूर्व ही दुर्गा ने पहला तीर छोड़ा। निशाना अचूक था। तीर बाघ की दायीं आँख में जा धँसा। तीर लगने के बावजूद बाघ ने छलांग मारी परन्तु सजग दुर्गा पैंतरा बदलकर दूसरी तरफ हट गई। उसने दूसरे तीर से उसकी दूसरी आँख को अपना निशाना बनाया।
अंधा बाघ पीछे मुड़कर भाग चला। शिकार को हाथ से निकलता देख दुर्गा ने उसकी पिछली टांगों को अपना निशाना बनाया। बाघ धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा अब न तो वह देख सकता था और न ही भाग सकता था।
आश्वस्त होने के लिए दुर्गा ने दूर से ही धराशायी बाघ पर पत्थर फेंका। पत्थर लगने के बावजूद बाघ उठ नहीं सका। हाँ, वह गुर्रा जरूर रहा था। दबे पाँव दुर्गा घायल बाघ के समीप जा पहुँची। तभी उसे अपनी कमर से लिपटी घोड़ी की लगाम की याद आयी। लगाम हाथों में लेकर उसने बड़ी सफाई से उसे बाघ के मुँह में पहना दी। अब बाघ पूरी तरह दुर्गा के वश में था। एक हाथ से लगाम पकड़े हुए दुर्गा ने दूसरे हाथ से बाघ की पिछली टांगों में चुभे हुए तीरों को खींचकर बाहर निकाला। बाघ खड़ा हो गया। लगाम संभाले हुए दुर्गा उसकी पीठ पर सवार होकर उत्सव स्थल पर पहुँची। उस समय वह साक्षात दुर्गा की अवतार लग रही थी। उपस्थित लोग उस किशोरी का दुस्साहस देखकर अचंभित हो गये।
आगे चलकर यही दुर्गा रानी दुर्गावती के नाम से लोकप्रिय हुईं तथा स्वाधीनता के लिए अकबर की सेना के खिलाफ जूझते हुए रणक्षेत्र में शहीद हो गईं। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में इस वीरांगना का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
(साभार: विद्या भारती से सम्बद्ध सचित्र प्रेरक बाल मासिक देवपुत्र/ मई+जून अंक 1998)