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भोजपुरी गीत-संगीत की धवल धारा : डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

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संस्मरणात्मक आलेख : डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी से मेरा परिचय भोजपुरी-सेवी साहित्यकार के नाते सन् उन्नीस सौ निन्यानबे ई. के एक 'भोजपुरी कवि सम्मेलन' में हुआ था। कवि सम्मेलन को संचालित करने वाले महानुभाव ने काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए जब इनका परिचय देना प्रारंभ किया तो मुझे हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (उत्तर प्रदेश) द्वारा सन् उन्नीस सौ पंचानवे ई. में आयोजित 'हिन्दी दिवस' और उस अवसर सम्पन्न विविध संगोष्ठियों का स्मरण हो आया। इधर डॉ. सुभद्रा वीरेन्द्र जी अपने काव्य-पाठ के निमित्त अपने होठों पर हल्की मुस्कान लिए शालीनता के साथ जैसे ही माइक के पास जाकर खड़ी हुईं कि पूरा पंडाल करतल-ध्वनियों से गूंज उठा। बड़े ही विनम्र भाव से बोलीं - 'भोजपुरी के एगो छोट गीत सुना दे तानी।' फिर पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मंच और पंडाल में बैठे काव्य-रसिकों के आग्रह पर इन्हें एक नहीं, तीन-तीन गीत सुनाने पड़े थे। जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां आज भी मैं यदा-कदा गुनगुना लेता हूँ। आप भी गुनगुनाइए - ' धीर मन के कतना धरावत रहीं, पीर हियरा में कबले बसावत रहीं। गि...

सुकरात से स्वप्नवार्ता - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

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सुकरात यूनान के महान दार्शनिक आ प्रखर प्रभावी वक्ता रहलें। उनका प्लेटो आ जेनोफर जइसन दार्शनिक के गुरु आ अरस्तू जइसन चिंतक-विचारक के दादा गुरु होखे के गौरव प्राप्त रहे। प्राथमिक विद्यालय के हिन्दी के पुस्तक में सुकरात के एगो जीवनी पढ़े के मिलल रहे। जवना के अनुसार सुकरात के जनम यूनान के एथेंस राज्य का एगो सीमावर्ती गाँव में 469 ईसा पूर्व एगो सामान्य परिवार में भइल रहे। उनकर बाबूजी सोफ्रोनिसकस मूर्तिकार रहलें आ माई दाई के काम करत रहली। उनका प्रारंभिक गुरु के नाम क्रीटो रहे। उनका पहिलकी मेहरारू मायरटन से दू बेटा लाम्प्रोकेस आ मेनेक्सेनस उर दूसरकी मेहरारू जैन्थआइप से एगो बेटा सोफ्रोनिसकस रहलें। सुकरात जीवन एथेंस में बीतल। बचपन में ऊ अपना बाबूजी का काम में हाथ बटावस। सेयान भइला पर उनकर नोकरी सेना में लाग गइल। ऊ पैटीडिया के लड़ाई में वीरतापूर्वक लड़बो कइलें। जवना के चलते उनकर सेनापति उनका से बहुत खुश रहे। कुछ दिन ऊ एथेंस का काउंसिल के सदस्यो रहलें। ऊ जब जहँवा जवना दायित्व में रहलें, उहाँ ईमानदारी आ लगन से अपना दायित्व के निर्वहन कइलें। कबो गलत व्यक्ति, विचार भा बेवस्था के साथ ना दिहलें आउर ना...

पाइथागोरस से स्वप्नवार्ता - डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

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नउवाँ-दसवाँ में पाइथागोरस के प्रमेय पढ़ले रहीं। गुरु जी खूब मनोयोग से पढ़ावस। कबो पल्ले पड़े आ कबो नाहियो पड़े। कबो ब्लैक बोर्ड पर जाके प्रमेय सिद्ध कर दीं स त पीठ ठोकस आ कबो सिद्ध ना होखे त सीसो का डंटा के तरहथी पर ताबड़तोड़ हुम्चउआ पड़े। एने आके जब ईसा से ८०० साल पहिले के भारत के महान गणितज्ञ, दार्शनिक आ धर्मगुरु बौधायन के शुल्ब सूत्र का ओह प्रमेयन के जाने के मिलल जवन यूनानी गणितज्ञ का कई प्रमेयन से हू-ब-हू मिलत रहे त हम अचरज में पड़ गइनीं। बौधायन के प्रमेय बा - 'दीर्घास्याक्षणया रज्जु: पार्श्वमानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयांकरोति।।' मतलब, एगो आयत के विकर्ण ओतने क्षेत्र एकट्ठा बनावेला जेतना कि ओकर लम्बाई आ चौड़ाई अलग-अलग बनावेलें। हम पाइथागोरसो में इहे प्रमेय पढ़ले रहीं। फेर हम बौधायन आ पाइथागोरस के गुन-धुन में पड़ल-पड़ल कुछ सोचते रहीं कि हमार कब आँख लाग गइल, पते ना चलल। फेर सपना में देखऽतानी जे एगो खूब लम्बा-चौड़ा बुढ़ आदमी जेकर दाढ़ी आ मोछ खूब उज्जर रहे। देह पर उजरे चद्दर ओढ़ले सामने खड़ा मुस्का रहल बा। हम कवनो महान व्यक्ति के आगमन मानके माथ नवावत पूछलीं-...

दू टुम: डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

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भोजपुरी के स्वाभाविक सवाद तबे मिल सकेला जब एकरा बोले के लहजा ( टोन ) बुझाई। सुने के लकम हो जाई। लिखे के लूर हो पाई आ पढ़े के सहूर हो जाई। ई सुराघात आ बलाघात से लबदल लयात्मक आ रागात्मक स्वर प्रधान भासा ह। एह कुल्ह में इचको फरक भइल कि भाव के गरक भइल। एकरा ध्वनि प्रकृति, भाव प्रकृति, लिंग बिधान, उपसर्ग, प्रत्यय, परसर्ग, बिभक्ति, संग्या रूप, सर्वनाम, सामासिक बुनावट आ क्रियापद के बनावट सब का गझिन जानकारी के दरकार होला। खड़ी बोली के आधार बना के बोले-सुने आ लिखे-पढ़े वाला मनई ठाँवे चिन्हा जालें। रामाज्ञा प्रसाद सिंह 'विकल' सन् उनइस सौ छिआसी में ससना (बनियापुर) का एगो मंच से आपन कविता 'अब कहाँ बाटे' पढ़त रहस। जवना के कुछ बानगी रहे - ' फँसल दलदल में दल के दल, ना दलकल रत्ती भर छाती। हिला दे दाँत शत्रु के, जवानी अब कहाँ बाटे।। एह पर एगो गजलगो टुभुकलें कि जवानी स्त्रीलिंग ह एह से इहाँ होखे के चाहीं - 'जवानी अब कहाँ बीआ।' एह पर हम कहनीं जे महाराज, ई बताईं कि भोजपुरी लोक- बेवहार में 'जवानी चढ़ल बा' बोलल जाला कि 'जवानी चढ़ल बीआ' बोलल जाला। त ऊ कहलें- ...

भोजपुरी के संतकाव्य (वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर): डॉ. जयकान्त सिंह 'जय'

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१. 'निरगुन बानी' पुस्तक के संपादक के बा - क. कुलदीप नारायण झड़प आ डा. शंभु शरण ख. पाण्डेय कपिल  ग. सिपाही सिंह श्रीमंत घ. शुकदेव सिंह उत्तर - क. कुलदीप नारायण झड़प आ डा. शंभु शरण। २. 'निरगुन बानी' पुस्तक के प्रकाशक के बा - क. अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन ख. बिहार विश्वविद्यालय ग. भोजपुरी साहित्य परिषद्  घ. अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद उत्तर- क. अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन। ३. नौवीं सदी के शालवाहन पूरन भगत के नाम रहे- क. गोरखनाथ  ख. टेकमन राम  ग. चौरंगीपा भा चौरंगीनाथ  घ. सरहप्पा उत्तर- ग. चौरंगीपा भा चौरंगीनाथ । ४. चौरंगीनाथ का ग्रंथ के नाम बताईं - क. बीजक  ख. शब्द विवेक  ग. सबद  घ. प्राण संकली उत्तर - घ. प्राण संकली। ५. 'सालवाहन घरे हमरा जनम उतपति सतिमा झूठ बलीला।' केकर कहल भा लिखल ह - क. कबीर ख. भिनक राम  ग. लक्ष्मी सखी  घ. चौरंगीनाथ उत्तर - घ. चौरंगीनाथ। ६. गोरखनाथ कवना सम्प्रदाय के प्रवर्तक रहलें- क. नाथ सम्प्रदाय  ख. सखी सम्प्रदाय  ग. अघोर सम्प्रदाय  घ. सरभंग सम्प्रदाय उत्तर - नाथ सम्प्रदाय । ७. 'योगी'...